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ये विचार थे कांग्रेस के इजरायल के लिए. जानिए नेहरू से मनमोहन तक क्या सोचते थे इस बारे में

गाँधी परिवार जो की देश में आजादी के बाद से ही देश पर एकछत्र राज करता आया है. पंडित जवाहर लाल नेहरू जो की देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे उनकि नीतिया जो की गृह अस्तर पर भी विफल रही और विदेश नीति पर भी. नेहरू ने देश के अंदर जिस तरह से वलभ भाई पटेल का हाथ झटका उसी तरह से विदेश नीति पर इजरायल जो की बार-बार दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा था उसका हाथ छोड़ उन इस्लामिक देशों का हाथ थामने में लगे थे जहां से भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए पैसे भेजे जाते थे।
   
कांग्रेस अब भी उन को अवार्ड देती है जो बेवकूफों के तरह बात-बात पर अवार्ड वापिस कर देते है। ठीक इसी तरह उस वक़्त के नेहरू के करीबियों में से एक महान वैज्ञानिक आइंस्टाइन के बात तक को नहीं माना। उस वक्त इजरायल ने भारत से समर्थन प्राप्त करने के लिए उस वक्त के सबसे बड़े आइकॉन, दुनिया के महान वैज्ञानिक और यहूदी चेहरे अलबर्ट आइंस्टाइन को भेजा था। अलबर्ट आइंस्टाइन के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे. पंडित नेहरू के आइंस्टाइन ने 13 जून 1947 को लिखे 4 पन्ने के एक खत में लिखा था कि प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में है, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।  

उन्होंने खत में और जोड़ते हुए यहूदियों पर हुए अत्याचार का विस्तार से जिक्र भी किया गया था। इसके अलावा आइंस्टाइन ने पं नेहरू को यह भी तर्क दिए थे कि यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र क्यों होने चाहिए. और सबसे बड़ी और अचंभित करने वाली बात उस खत को पं. नेहरू ने करीब एक महीने तक दबाए रखा। और आखिरकार 11 जुलाई 1947 को अपने जवाब में लिखा कि मुझे यहूदियों के प्रति बेहद सहानुभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। पं. नेहरू की इसी सोच पर 1992 तक भारत की विदेश नीति चलती रही। लेकिन जैसे ही 1991 में सोवियत संघ रूस का विघटन हुआ और भारत के आर्थिक सुधार के तहत अमेरिकी संबंधों के दरवाजे खोले इसमें अमेरिकी संबंधों की छाव में इजरायल से करीबी रिश्ते बनने की शुरूआत हुई।

दरअसल, कांग्रेस पार्टी ने 1916 लेकर 1992 तक इजरायल का विरोध ही किया है। यहीं नहीं अरब-इजरायल युद्धों के दौरान भारत अरबों के साथ ही खड़ा रहा है। जो देश पंडित नेहरू के समय से दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा अपने लोगो को भारतीयों से दोस्ती करने को, भारत की सभ्यता और संस्कृति समझने को कह रहा उस देश से भारत की कांग्रेस सरकार लगभग जब तक सरकार थी सत्ता में तब तक दुरी बनाये हुए थी। मोदी का इजरायल दौरा ऐतिहासिक रहा और साथ के नए आयाम जुड़े और इजरायल के लोगों को पीएम मोदी से ये उम्मीद है कि वो इजरायल के साथ भारत के संबंधों को ना केवल आगे बढ़ाएंगे बल्कि मजबूत भी करेंगे। न जाने नेहरू कौन सी राजनीति पूर्वाग्रह से ग्रसित थे की इतने अच्छे और सच्चे मित्र देश को दरनिकार कर अरब देशो की तरफ जो की आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा था आकर्षित थे।

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