ब्लास्ट के संदिग्धों को फ़ौरन मिल गये २ लाख जबकि रो कर चुप हो गये CRPF बलिदानियों के बच्चे.. वो प्रदेश कश्मीर नहीं बल्कि कोई और है ..

यदि इसी को धर्मनिरपेक्ष राजनीति कही जाती है तो क्या आप इसको सही मानेगे ? आखिर अभी क्या क्या और देखना होगा देश और देशवासियों को कथित सेकुलरिज्म के नाम पर ? भारत में जहाँ राष्ट्र का रक्षक सेना का जवान खुद को बलिदान कर के देश को बचाता है तो उसके परिवार वाले अनुदान पाने के लिए लम्बे समय तक प्रतीक्षा करते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ ब्लास्ट के आरोपियों को बिना देर किये, बल्कि अन्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से लड़ और झगड़ कर अनुदान दिया जाता है .

ममता बनर्जी द्वारा की जा रही एकदम नई राजनीति का एक और दृश्य उस समय देखने को मिला जब भदोही ब्लास्ट के मृतको की तरफ शक की सुई घूम गयी .  उत्तर प्रदेश के भदोही स्थित पटाखा कारखाने में हुए विस्फोट में मारे गए पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के रहने वाले नौ लोगों की भूमिका जांच में संदिग्ध पाई गई है। रविवार को घटनास्थल से ग्रेनेड बरामद होने के बाद विस्फोट मामले में नया मोड़ आया है।

पता चला है कि मृतक साधारण मजदूर न होकर ग्रेनेड जैसे खतरनाक बम बनाने में प्रशिक्षित थे। जहां विस्फोट हुआ था, वह पटाखे की एक दुकान थी। बाद में पता चला कि वहां पटाखे बनाए जाते थे। अब वहां से ग्रेनेड बरामद किए गए हैं जो अमूमन सेना या माओवादियों अथवा आतंकियों के पास होते हैं। एक साधारण से गांव के पटाखा कारखाने में ग्रेनेड कहां से आया, इसे लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।  यूपी पुलिस से घटना की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने ले लिया है और उत्तर प्रदेश एटीएस के साथ मिलकर इसकी जांच पड़ताल शुरू की है। सोमवार को एनआईए सूत्रों के मुताबिक, घटना में मारे गए 13 लोगों में से नौ लोग पश्चिम बंगाल के थे।

शव लेने के लिए बंगाल पुलिस की एक टीम भदोही पहुंची है। फिलहाल सभी का बैकग्राउंड खंगाला जा रहा है। पता चला है कि कारखाने में ग्रेनेड बनाया जा रहा था। इसे तैयार करने के लिए पुख्ता प्रशिक्षण की जरूरत होती है, जो बम बनाने के एक्सपर्ट ही कर सकते हैं, लेकिन ऐसा प्रशिक्षण आतंकी दे सकत हैं या माओवादी। ऐसे में मारे गए नौ लोग संदिग्ध हैं और उन्हें साधारण मजदूर के तौर पर नहीं देखा जा रहा है।   कुल मिलाकर कहा जाए तो शनिवार सुबह जब विस्फोट हुआ तब ऐसा लगा था जैसे बंगाल के नौ साधारण मजदूर इसमें मारे गए हैं, लेकिन अब मारे गए लोगों की भूमिका संदिग्ध होती जा रही है। उधर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने मारे गए लोगों को किसी भी तरह की आर्थिक मदद देने से इन्कार कर दिया है।

उत्तर प्रदेश प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि मारे गए लोग आपराधिक वारदात में शामिल थे, इसीलिए उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी। जबकि घटना के दूसरे दिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मारे गए मालदा बंगाल के नौ लोगों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक मदद दे दी।  राज्य के शहरी विकास मंत्री और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने रविवार को मालदा जाकर इन सभी मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक मदद दी है। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार पर भी हमला बोला था। अब जब यह मामला दूसरी ओर मुड़ता जा रहा है और मारे गए लोगों की गतिविधियां संदिग्ध होती जा रही हैं, तब जल्दबाजी में ममता सरकार द्वारा इनके परिजनों को दी गई धनराशि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, गत 14 फरवरी को पुलवामा में आतंकी हमले हुए थे, जिसमें बंगाल के दो जवान बलिदान हो गए थे। छह दिनों तक ममता बनर्जी ने शहीद परिवारों को आर्थिक मदद देने में चुप्पी साध रखी थी। विपक्ष के चौतरफा हमले के बाद 20 फरवरी को शहीद जवानों के परिजनों के लिए आर्थिक मदद की घोषणा की थी, जबकि उत्तर प्रदेश के भदोही में पटाखा कारखाने में हुए विस्फोट में मारे गए लोगों के परिजनों को उसी दिन आर्थिक मदद की घोषणा ममता ने कर दी थी। खास बात यह है कि जो लोग मारे गए हैं, वे सभी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। ऐसे में एक बार फिर राज्य सरकार की तत्परता को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं


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