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समान नागरिक संहिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद चौंक गये चरमपंथी.. क्या अगला नंबर इस क़ानून का ?

समान नागरिक संहिता: अर्थात देश के हर धर्म-समुदाय के नागरिक के लिए एक समान क़ानून.. ये मुद्दा है जो हमेशा से भारतीय जनता पार्टी के मूल एजेंडे में रहा है. चरमपंथियों तथा कथित लिबरलों को छोड़ दें तो देश की ज्यादातर जनता भी इस कानून की पक्षधर है कि जब भारत एक एस्क्यूलर राष्ट्र है तब देश के सभी नागरिकों के लिए समान क़ानून क्यों नहीं है? सामान नागरिक संहिता कब लागू होगी, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इससे पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर ऐसी टिप्पणी की है, जिसे सुन चरमपंथी चौंक गये हैं.

खबर के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितंबर को देश के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) तैयार किए जाने पर जोर दिया. इसके साथ ही उसने अफसोस जताया कि उसके प्रोत्साहन के बाद भी एक भी बार इस मकसद को हासिल करने की कोई कोशिश नहीं की गई.  न्यायालय ने कहा कि संविधान निर्माताओं को आशा और उम्मीद थी कि राज्य पूरे भारतीय सीमा क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित कराने की कोशिश करेगा, लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि गोवा एक बेहतरीन उदाहरण है जहां समान नागरिक संहिता है और धर्म की परवाह किए बिना सब पर लागू है सिवाय कुछ सीमित अधिकारों की रक्षा करते हुए. गोवा के मामले का जिक्र करते हुए कहा, “जिन मुस्लिम पुरुषों की शादियां गोवा में पंजीकृत हैं, वे बहुविवाह नहीं कर सकते. इसके अलावा इस्लाम के अनुयायियों के लिए भी मौखिक तलाक का कोई प्रावधान नहीं है.” न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि यह गौर करना दिलचस्प है कि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों से जुड़े भाग चार में संविधान के अनुच्छेद 44 में निर्माताओं ने उम्मीद की थी कि राज्य पूरे भारत में समान नागरिक संहिता के लिए प्रयास करेगा लेकिन आज तक इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू कानून तो 1956 में वजूद में आया, लेकिन देश के सभी नागरिकों पर समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. पीठ ने यह भी कहा, 1985 में शाह बानो मामला, 1995 में सरला मुद्गल व अन्य बनाम भारत सरकार मामला और 2003 में जॉन वेल्लामैटम बनाम भारत संघ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता की हिमायत की थी, लेकिन अफ़सोस अब तक इसे लेकर कोई प्रयास नहीं किया गया.

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