नेताजी सुभाष के बलिदान में फ्रांस की रिपोर्ट है चौंकाने वाली. पढ़िए एक बड़ी साजिश का खुलासा

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक ऐसे क्रांतिकारी जिनसे ब्रिटिश सरकार भी डरती थी. ब्रिटिश सरकार डर था अगर नेताजी भारत में रहे तो जल्द ही उन्हें यहाँ से वापस जाना पड़ेगा. अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से नेताजी ने ब्रिटिश सरकार की नाक में इतना दम कर दिया था कि ब्रिटिश सरकार नेताजी को भारत से किसी भी तरह से दूर रखने के बहाने खोजती रहती थी और साथ ही साथ ब्रिटिश सरकार को यह दर भी सताता कि कही नेताजी विदेशों में पड़ रहे भारतीय विद्यार्थियों को    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के लिए उकसाये ना. लेकिन जिसका अंग्रेजो को डर था वही हुआ.

नेताजी पहले भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने देश से बाहर रहते हुए भी अपनी सेना गठित की और ब्रिटिश भारत सरकार के खिलाफ युद्ध की चुनौती दी और युद्ध भी किया. देश की जनता से उन्हें बेहत प्यार और साथ मिला जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 18 अगस्त 1945 विमान दुर्घटना से मौत की खबर आयी तो सभी सन रह गए. लेकिन उनका शव न मिलने के कारण उनकी मौत एक रहस्य बनकर रह गयी. उनकी मौत का रहस्य सुलझाने के लिए तीन आयोग नियुक्त किये गए जो थे, शाह नवाज कमेटी (1956) और खोसला आयोग (1970) और मुखर्जी आयोग (1999).

शाह नवाज कमेटी और खोसला आयोग के अनुसार नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ही हुई थी लेकिन मुखर्जी आयोग के अनुसार नेताजी की मौत विमान  दुर्घटना में नहीं हुई थी. मुखर्जी आयोग की इस रिपोर्ट को सरकार ने ख़ारिज कर दिया था. भारत सरकार द्वारा नेताजी से जुड़े सारे दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया था जिसमें विमान दुर्घटना में होने की पुष्टि की गयी है. एक बार फिर यह रहस्य चर्चा का विषय बना है.

पेरिस के रहने वाली इतिहासकार जीबीपी मोरे ने कहा कि बोस की मौत हवाई जहाज दुर्घटना में नहीं हुई और वह 1947 में जिंदा थे. मोरे ने यह दावा फ्रांस के नेशनल आर्काइव की 11 दिसंबर 1947 के एक दस्तावेज के आधार पर किया है। जिसमे उन्होंने बताया कि दस्तावेज में कहीं भी ये नहीं लिखा था कि नेता जी सुभाषचंद्र बोस की मौत ताइवान में हुए एयरक्रैश में हुई। रिपोर्ट में लिखा गया था कि बोस को 1947 के अंत में देखा गया था। इस खुलासे ने नेताजी के मौत के पर एक बार फिर सवाल उठाये है।  आखिर नेताजी की मौत कैसे और कब हुई?

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