ये तस्वीर जिसकी है उसे जानकर आप देखेंगे न्याय, नीति और ईमानदारी का एक ऐसा चेहरा जिस पर आपको यकीन नहीं होगा

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं दी। श्री मोदी ने ट्वीट कर कहा कि प्यारे अटल जी को जन्मदिन पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं। उनके नेतृत्व में भारत का विकास हुआ और पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं। लेकिन क्या किसी को ये मालूम है कि जिस अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत का विकास किया उसका परिवार किस तरह से अपना जीवन यापन करता हैं। जी हां आपको बता दे कि जब कोई राजनीति में कदम रखता है तो वो सबसे पहले अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को बारें में सोचता हैं।

लेकिन अगर आप अटल बिहारी वाजपेयी के घर वालों के बारें में जानेगें तो हैरान रह जाएगे

आपको बता दे कि यहां आज भी उनकी फैमिली के लोग रहते हैं। इस गांव का इतिहास जितना वैभवशाली है, उतना ही बुनियादी समस्यासओं से जूझ रहा है। हैरानी की बात ये है कि आजतक इस गांव को किसी भी सांसद ने गोद नहीं लिया।
अटल बिहारी के भतीजे रमेश चंद्र वाजपेयी ने बताया कि मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, इसलिए पत्नी को ही सारा काम देखना होता है।

आस-पास के 6 घरों के लिए एक हैंडपंप लगा हुआ है। पाइपलाइन नहीं है। मजबूरी में, पत्नी को काफी दूर से पानी भरकर लाना होता है।
अटल जी जब से बीमार हुए हैं, तब से गांव के विकास के बारे में कोई पूछने भी नहीं आता। रोजाना 16 घंटे से ज्याेदा बिजली कटौती होती है। बटेश्व र गांव, फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसके सांसद चौधरी बाबूलाल हैं। उन्होंने बताया कि सांसद ने भी हमारे गांव को गोद लेने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

वहीं, सांसद के प्रवक्ता रामेश्वकर कहते हैं कि बटेश्वेर के विकास में सांसद ने काफी योगदान किया है। वाजपेयी मोहल्लेद की सड़क बनवाई गई है।
बटेश्वनर गांव के वाजपेयी मोहल्लेज में 90 के दशक तक रौनक रहती थी। यहीं से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति शुरू की थी। अब वाजपेयी मोहल्ला् उजड़ चुका है। अटल जी का घर खंडहर बन चुका है। इनके घर के आस-पास पांच मकान और परिवार मौजूद हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री के भतीजे और रिटायर्ड टीचर रमेश चंद्र ने बताया, अच्छाक भविष्यस बनाने के लिए वाजपेयी मोहल्लेऔ का परिवार शहरों में चला गया। ज्या्दातर लोग तो कभी लौटकर नहीं आए। आखिरी बार अटल जी यहां साल 2003 में आए थे। उस समय उन्हों ने रेल लाइन का शिलान्याहस किया था।
बटेश्वर को तीर्थस्थल नहीं, बल्कि तीर्थराज कहा जाता है। वह इसलिए, क्योंकि यहां आस्था के केंद्र 101 शिव मंदिर हैं। मंदिर के घाटों को छूती यमुना यहां विपरीत दिशा में बहती हैं। पानीपत के तीसरे युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हजारों मराठों की स्मृति में मराठा सरदार नारू शंकर ने बटेश्वर में एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया था, जो आज भी है। 

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