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बाबर के समर्थको से किया गया सवाल कि मस्जिद में देवताओं के चित्र क्यों ? अब तक नहीं दे पाए जवाब

अपनी ऊट पटांग और हिन्दू विरोधी दलील के दम पर अपने मामले को न्यायिक से ज्यादा हिन्दू विरोधी और धर्मविमुख बना रहे बाबर के समर्थको से कई ऐसे सवाल किये गये जिस पर वो अब तक निरुत्तर हैं.. भगवान श्रीराम के जन्मस्थल पवित्र अयोध्या में मस्जिद की जिद को ले कर स्थानीय अदालत से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ने वाले मुस्लिम पक्षकारो को ये दो टूक बता दिया गया है कि अब मध्यस्थता के नाम पर मामले को ज्यादा समय तक नहीं खींचा जा सकता है .

इसी के साथ उसी अदालत में उठे एक सवाल ने उन्हें बेचैन कर दिया है . ध्यान देने योग्य है कि इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार किसी भी प्रकार के चित्र या मूर्ति की पूजा जायज नहीं होती है ..उच्चतम न्यायालय ने बाबर की तरफ से खड़े मुस्लिम पक्ष से खंबों पर मूर्तियों और कमल के चित्रों को लेकर कई सवाल किए जिसका संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाया .. उच्चतम न्यायालय पूछा क्या इस्लाम के मुताबिक मस्जिद में ऐसे चित्र हो सकते हैं ? और साथ ही क्या किसी और मस्जिद में भी ऐसे चित्र होने के सबूत हैं ?

इस बहस से पहले जब धवन अपना दावा साबित करने के लिए न्यायालय का ध्यान १९५० की कुछ फोटो की ओर दिलाना चाह रहे थे उसी समय जस्टिस एसए बोबडे ने एक फोटो पर कहा कि रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने इसे गरुण का चित्र बताया है जो कि हिन्दू देवता हैं। उन्होंने धवन से कहा कि अगर आप इसे मस्जिद बता रहे हैं तो वहां फूल और जानवरों आदि के चित्र नहीं होने चाहिए। न्यायालय ने कहा कि वहां मिले कसौटी के खंबों पर कमल और अन्य मूर्तियां अंकित मिली हैं।

 

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