फिल्म जगत, वामपंथ, कथित सेक्यूलर व साहित्य जगत की सभी असहिष्णु टीमें शांत.. एक ट्वीट भी नहीं कमलेश तिवारी की ह्त्या पर


हिन्दू राष्ट्रवादी नेता कमलेश तिवारी की ह्त्या के बाद देशभर में हड़कंप मचा हुआ है. उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के हिन्दू कमलेश तिवारी की ह्त्या के बाद आक्रोश से भरे हुए हैं. कई जगह पर सड़क पर उतरकर भी हिन्दू संगठनों ने कार्यकर्ताओं ने आक्रोश जताया है तो कल कमलेश तिवारी की ह्त्या के बाद से ही सोशल मीडिया पर कमलेश तिवारी ट्रेंड कर रहे हैं. लोग सोशल मीडिया पर कमलेश तिवारी के हत्यारों को फांसी की सजा देने की मांग कर रहे हैं.

आश्चर्य की बात ये है कि दिनदहाड़े मजहब के नाम पर ISIS तथा तालिबान के अंदाज में कमलेश तिवारी की ह्त्या कर दी गई लेकिन न तो फिल्म जगत, वामपंथी, कथित सेक्यूलर वर्ग तथा साहित्य जगत के वो लोग इस जघन्य हत्याकांड पर पूरी तरह से मौन साध गये हैं जो आये दिन देश में असहिष्णुता का रोना रोते हैं. उन कथित लिबरलों तथा खान मार्केट गैंग की जीभ को या तो लकवा मार गया है या फिर उनका ट्विटर हैंडल काम नहीं का रहा है, तभी शायद वो लोग कमलेश तिवारी की ह्त्या पर एक ट्वीट तक नहीं कर पा रहे हैं.

लखनऊ में दिनदहाड़े मजहबी उन्मादियों ने कमलेश तिवारी का क़त्ल कर दिया लेकिन नसीरुद्दीन शाह को बिल्कुल भी डर नहीं लगा. घर में घुसकर मजहब के नाम पर एक हिंदूवादी नेता का गला रेत दिया गया लेकिन किसी भी उस बुद्धिजीवी ने अवार्ड वापस लौटाने की कोशिश नहीं की, जिन्होने एक समय देश असहिष्णुता की बात करते हुए सड़क से संसद तक को सर पर उठा लिया था. इन लोगों को कमलेश तिवारी की ह्त्या से न तो सेक्यूलरिज्म पर खतरा नजर आ रहा है और न ही इन लोगों के लिए ये ह्त्या असहिष्णुता है.

कहीं इसका कारण ये तो नहीं कि जीजन कमलेश तिवारी की ह्त्या हुई है वो हिन्दू थे, हिन्दू हित की बात करते थे तथा जिन हमलावरों ने कमलेश तिवारी की ह्त्या की, वो उस समुदाय से हैं जिन्हें ये फिल्म जगत, वामपंथी, कथित सेक्यूलर बुद्धिजीवी तथा साहित्य जगत के लोग शांतिप्रिय बताते हैं.. लेकिन सवाल ये है कि कमलेश तिवारी की जगह राशिद होता तथा रशीद की जगह कमलेश तिवारी क्या तब भी ये लोग चुप रहते ?


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