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क्यों राजेंद्र सदाशिव निखल्जे बना डॉन छोटा राजन, कैसे हुई दाऊद से दुश्मनी ?

मुंबई : मुंबई के तिलकनगर चेंबूर में 1956 में जन्म लेने वाला राजेंद्र सदाशिव निखल्जे कैसा बन गया छोटा राजन और कैसे बना वो एक हिन्दुवादी डॉन आज हम आपको बताएगें। राजेंद्र सदाशिव निखल्जे की छवि एक हिन्दुवादी डॉन की थी। राजेंद्र के पिता सदाशिव निखल्जे मुंबई बीएमसी में काम करते थे। सदाशिव निखल्जे के तीन बेटे और दो बेटियां थी। कम उम्र में ही राजेंद्र निखल्जे गलत संगत में पड़ गया और उसने अपनी पढाई को बीच में ही छोड़ दिया और पैसा कमाने के लिए निकल पड़ा। अपने जुर्म से लाबा-लब भरे करियर की शुरूआत उसने हाजी मस्तान, करीम लाला और वरदा भाई की बढ़ती ताकतों से प्रेरणा लेकर की।

चेंबूर और घाटकोपर का इलाका उन दिनों वरदा भाई के सहायक और डॉन राजन नायार ऊर्फ अन्ना राजन के प्रभाव वाले इलाके थे। गली कुंचों में मारपीट और दौ नंबर के छोटे मोटे अपराध करते करते राजेन्द्र पर डॉन राजन नायार ऊर्फ अन्ना राजन की नजर पड़ी जिसका काम नये नये छोकरों को अपनी गैंग में शामिल करना था। डॉन राजन नायार ऊर्फ अन्ना राजन को लोग बड़ा राजन भी कहते थे। बड़ा राजन की गैंग में राजेन्द्र बड़ा राजन की गैंग के लिए फिल्मों की टिकटों को ब्लैक करने लगा। राजेन्द्र की दिलेरी और बहादुरी उसे बड़ा राजन के करीब ले आई और बड़ा राजन ने उसे स्वर्ण तस्करी के धंधे से जोड़ दिया। निखल्जे को चेंबूर व घाटकोपर में गिरोह के सामान्य कार्यों की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई।

गैंग में राजेन्द्र की सभी बड़ा राजन से समान्ता करने लगे और राजेन्द्र सदाशिव निखल्जे बन गया छोटा राजन। 80 के दशक में मुंबई पुलिस की कड़ी कार्यवाही के बाद वरदा भाई मारा गया और हाजी मस्तान व करीम लाला की भी मौत हो गई। हाजी मस्तान की सत्ता संभालने वाले दाऊद की करीम लाला के वारिसों से जंग छिड़ी हुई थी। ऐसे में अपनी अलग सत्ता चला रहे बड़ा राजन ने जग दाऊद का साथ लेकर पठानों के खिलाफ जंग छेड़ी तो उस जंग में बड़ा राजन मारा गया। बड़ा राजन के मारा जाने पर छोटा राजन ने गैंग की भाग दौर शामाली।

छोटा राजन को एक विश्वसनीय और ताकतवर सहारे के रूप में दाऊद का साथ मिला। दाऊद से गहरी दोस्ती के पीछे यहीं वजह ही नहीं थी वरन एक वजह ये भी थी कि उसक साथ राजन का भावनात्मक लगाव था। दरअसल, छोटा राजन की पत्नी सुजाता दाऊद के राखी बांधने लगी। उसके बाद दाऊद भारत से दुबई चले गया और वही से ही अपनी सत्ता को चलाने लग व छोटा राजन उसके मुंबई के काम को देखने लगा। 1987 में छोटा राजन भी दुबई चला गया और डी कम्पनी का काम देखने लगा। सन् 1988 खत्म होते होते शकील अहमद बाबू ऊर्फ छोटा शकील भी दुबई पहुंच गया।

छोटा शकील को दाऊद व छोटा राजन की दोस्ती पसंद नहीं आई और उसने दोनों के बीच फुट डालनी शुरू कर दी। 1992 के आते आते दोनों के बीच मतभेद आ गया और दाऊद ने छोटा राजन के करीबीओं को अपने नेपाली शूटर से मरवा दिया। जब ये छोटा राजन को पता चला तो उसने दाऊद के शूटर को नेपाल में मरवा दिया। उसके बाद बाबरी मस्जिद ध्वस्त हो जाने के बाद दाऊद की पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से निकटता हो गई और वह आईएसआई की साजिश का खिलौना बनकर इसक बदले में मुंबई बम विस्फोट की योजना बना रहा था। दाऊद ने यह काम छोटा राजन को देना चहा रहा था मगर छोटा राजन के हिन्दुवादी डॉन था तो छोटा राजन को किनारा कर यह काम छोटा शकिल को दिया गया। दाऊद ने छोटा राजन के कुछ ओर आदमीयों को मार दिया फिर क्या था। अपने आदमीयों की मौत और दाऊद के पाकिस्तानी रिश्ते छोटा राजन को उसके विरूद्व खड़ा कर दिया। रोज दोनें के बीच गैंगवार होने लगी। दाऊद को छोटा राजन का हमेसा खतरा लगा रहता है।

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