तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट बोल पड़ा नहीं आंच आने देगें महिलाओं के अधिकार पर

नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आदेश दिया है कि तीन तलाक में मुस्लिम महिला की गरिमा और सामाजिक स्तर पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इससे महिलाओं की मौलिक अधिकार का हनन हो सकता है। कोर्ट का कहना है कि ये रस्में मुस्लिम महिलाओं को उनकी कम्युनिटी के पुरुषों और दूसरी कम्युनिटी की महिलाओं के मुकाबले कमजोर बना देती है। केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दी गईं लिखित दस्तावेजों में यह बातें बताई है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इस केस कि सुनवाई 11 मई को होगी। बता दें कि इसे पहले भी केंद्र सरकार ने ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला और कई शादियों जैसी प्रथाओं का विरोध किया था। केंद्र ने कोर्ट से अपील की थी कि उसे लैंगिक समानता और धर्मनिरपेक्षता के तौर पर इन सब मामलों को देखना होगा। इसके अलावा ट्रिपल तलाक का लेकर कोर्ट में कई प्रतिशेषों की फाइल की गई थीं। इनमें से एक सायरा बानो नाम की महिला ने दायर की थी। इसमें उन्होंने ट्रिपल तलाक और ऐसे ही मुद्दों पर कोर्ट से दखल की मांग की थी।
 
ये थे चार सवाल जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने मोहर लगाई
-धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तीन तलाक, हलाला और बहु-विवाह की इजाजत संविधान के तहत दी जा सकती है या नहीं?
-समानता का अधिकार, गरिमा के साथ जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्राथमिकता किसे दी जाए?
-पर्सनल लॉ को संविधान के आर्टिकल 13 के तहत कानून माना जाए या नहीं?
-क्या तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह उन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सही है, जिस पर भारत ने भी साइन किए हैं?

गौरतलब है कि हाल ही में हामिद अंसारी की पत्नी ने तीन ताकल के विरोध में आवाज उठाई थी।

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