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अब तो पुलिस ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि – “देश के लिए बड़ा ख़तरा हैं शहरी नक्सली”

पिछले दिनों भीमा कोरेगांव हिंसा में नक्सलियों की मदद करने के आरोप में ५ लोगों(शहरी नक्सली” की गिरफ्तारी के बाद देशभर में बहस शहरी नक्सलियों को लेकर बहस छिड़ी हुई है. जहाँ तथाकथित मानवाधिकारी, बुद्धिजीवी व तमाम राजनेता शहरी नक्सली शब्द की थ्योरी को ही खारिज कर रहे हैं तथा कह रहे हैं कि ये भाजपा का एक प्रोपगेंडा है तथा इस बहाने भाजपा सरकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परेशान कर रही है वहीं देश का एक बहुत बड़ा वर्ग इस बात को स्वीकार कर रहा है कि जितने खतरनाक जंगलों में रहने वाले नक्सली हैं, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक शहरों में रहने व्वाले उनके मददगार ये शहरी नक्सली है. शहरी नक्सलियों को लेकर हो रही बहस के बीच समाज की रक्षक पुलिस भी इस बात को मां रही है कि शहरी नक्सली देश के लिए एक बहुत बड़ा खतरा हैं.

शहरी नक्सलियों को देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना है झारखण्ड पुलिस ने. झारखंड पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने कहा कि ‘शहरी नक्सलवाद’ वास्तव में एक खतरा है. झारखंड पुलिस का कहना है कि अक्सर मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा बुद्धिजीवी माओवादियों को समर्थन देते हैं और नक्सल आंदोलन को बढ़ावा देते हैं लेकिन दूसरी ओर नक्सलवाद के समाधान के लिए प्रणाली तैयार करने की भी मांग करते हैं. झारखंड के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ऑपरेशन और कानून एवं व्यवस्था) आर के मल्लिक ने कहा कि  मैं आपको इसका एक जीता जागता उदाहरण दे सकता हूं. उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले जब झारखंड सरकार ने नई आत्मसमपर्ण नीति की घोषणा की थी और मुख्यधारा में शामिल होने वाले कई माओवादियों को इसका लाभ भी मिला. परन्तु आत्मसमपर्ण नीति का विरोध करने वाले लोगों ने उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर दी थी.’ श्री मल्लिक ने कहा कि इसमें अक्सर ‘धन भी’ अपनी भूमिका निभाता है क्योंकि हमेश बुद्धिजीवियों का रुख माओवादियों और कथित सरकार की मनमानी में से माओवादियों के पक्ष में रहा है जो ‘स्वैच्छिक’ नहीं है.

श्री मल्लिक ने कहा इसके अलावा यह समय बहुत महत्वपूर्ण है तथा हम मामले की प्रगति पर नजर रखे हुए हैं. इस प्रवृति के रूप में हमने बुद्धिजीवियों की झल्लाहट को समाचार पत्रों के कॉलम में देखा है. जब भी माओवादी या नक्सली तत्व दवाब में होंगे तो यह और बढ़ेगा. अपने तर्क पर जोर देते हुए श्री मल्लिक ने कहा कि पिछले तीन साल में विशेष एरिया कमेटी के सदस्य समेत लगभग 100 कैडरों के आत्मसमपर्ण के बाद राज्य में नक्सली अत्यधिक दबाव में आ गये. इस वर्ष जून में राज्य मंत्रिमंडल ने मुख्यधारा में शामिल हाने वाले ‘अधिक से अधिक’ आत्मसमपर्ण करने के लिए सरकार ने नयी आत्मसमपर्ण और पुनर्वास नीति तैयार करने के लिए मंजूरी दे दी है जिसका लाभ भी हो रहा है और यही वो जगह है जहाँ शहरी नक्सली अपना खेल खेलते हैं.

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