एक और मॉब लिंचिंग हुई है बिजनौर में जिसमे मार डाला गया है सलीम.. लेकिन जानिये क्यों छाई है इस पर ख़ामोशी ?

एक बार फिर से सलीम को घेर कर मारा गया है , वहां भी भीड़ थी और मारो मारो के नारे लगे थे .. तब तक वार होते रहे जब तक सलीम ने आँखे नहीं मूँद ली . सलीम के घर वाले ये सोच रहे थे कि शायद उनके लिए आवाज उठेगी उस वर्ग विशेष द्वारा जो ट्रेन में सीट के झगड़े को भी गाय का विवाद बना और बता दिया करता है. सलीम के घर वालों की ये आशा बेमानी निकली और सलीम के लिए आवाज उठाने वाल कोई भी सामने नहीं आया .. असल में शायद ये घटना उनके खांचे में फिट नहीं बैठती .

ध्यान देने योग्य है कि कभी दादरी के अखलाख की घटना पर दिल्ली तक के मुख्यमंत्री पहुच गये थे लेकिन उत्तर प्रदेश के ही जनपद बिजनौर में सलीम को केवल इसलिए पीट पीट कर मार डाला गया है क्योकि वो आदिल के घर अश्लील मैसेज भेजता था .. आदिल ने जब इसको अपने घर में बताया तब उनके घर के मोईनुद्दीन ने तय कर लिया कि सलीम की सजा केवल मौत है और जमा कर लिया अपने साथ कई अन्य को भी .. सब के सब उन्मादी हो कर टूट पड़े सलीम पर ..  मामला जिले के शेरकोट थाना इलाके के गांव मंडौरा का है.

मोइनुद्दीन और उसका भाई आदिल दिल्ली में रहकर काम करते हैं। आरोप है कि सलीम ने आदिल के फोन पर कोई आपत्तिजनक मैसेज कर दिया था। जिसके लेकर आदिल और सलीम की फोन पर ही दो दिन पहले नोकझोंक हुई। अब आदिल का भाई मोइनुद्दीन गांव आया था। जिसने मैसेज को लेकर ही सलीम के साथ मारपीट की। पुलिस ने मोइनुद्दीन उर्फ मोनू, भाई फईम, नईम पुत्रगण बुंदू, यामीन, शमसुद्दीन, वसीम और तहसीम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करते हुए कार्रवाई शुरु कर दी है।

गांव में एहतियात के तौर पर पुलिस बल की तैनाती की गई। यहाँ ये ध्यान रखने योग्य है कि इस घटना में मरने और मारने वाले दोनों पक्ष मुस्लिम समुदाय के हैं जिसके चलते तथाकथित सेकुलर वर्ग और बड़ा बुद्धिजीवी समाज खामोश रहा और अंत तक तलाशता रहा इस पूरी घटना में किसी हिन्दू का नाम जो उन्हें नहीं मिला .. अचानक ऐसी ख़ामोशी देख कर अब सलीम के घर वाले भी हैरत में हो सकते हैं कि उनके लिए दिल्ली से ले कर बंगाल तक के वही लोग मुआवजा और फ़्लैट आदि की मांग क्यों नहीं कर रहे हैं..

सवाल ये भी उठ रहा है कि कान्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की मानसिकता के अनुसार क्या मॉब लिंचिंग की घटना के लिए पीड़ित मुसलमान और हमलावर हिन्दू होना चाहिए ? हिन्दुओ का ये अंध विरोध आखिर कब तक और कहाँ तक जा कर खत्म होगा ये भी एक बड़ा सवाल है, ख़ास कर उन नेताओं से जिनकी पार्टियाँ हिन्दू विरोध के चलते खुद खत्म होने की कगार पर हैं पर वो अपने हिन्दू विरोध के सिद्धांत से इंच भर हटने को तैयार नहीं है .. 


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