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आये थे मोदी का विरोध करने.. मार डाला सिपाही को. हाथ में थे लाल झंडे और होठो पर था “खून बहेगा” का नारा

अभी बुलंदशह हिंसा में मारे गए इंस्पेक्टर के आरोपी की ठीक से पहचान तक नहीं हो पाई थी कि गाजीपुर में हुई भीड़ की हिंसा में कांस्टेल सुरेश वत्स को अपनी जान गंवानी पड़ी।गाजीपुर हिंसा में बलिदान हुए कांस्टेबल के बेटे ने यही सवाल पूछा। शहीद कांस्टेबल सुरेश वत्स के बेटे वीपी सिंह ने मीडिया से बात करते हुए राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कुए। उन्हंने कहा, “पुलिस खुद की सुरक्षा नहीं कर पा रही है। ऐसे में उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है। हम मुआवजे का क्या करेंगे। इससे पहले प्रयागराज , बुलंदशहर और प्रतापगढ़ में भी ऐसी ही घटना हुई थी।”

ग़ाज़ीपुर सदर के क्षेत्राधिकारी महिपाल पाठक ने बताया, “सिपाही सुरेश वत्स पीएम की सभा में ड्यूटी पूरी करके लौट रहे थे. निषाद समुदाय के कुछ लोग नौनेरा इलाके में अटवा मोड़ पुलिस चौकी पर प्रदर्शन कर रहे थे. यहीं कुछ लोगों ने पत्थरबाज़ी की जिसमें उन्हें ज़्यादा चोट लग गई. अस्पताल में उनकी मौत हो गई. घटना के बाद ग़ाज़ीपुर के डीएम के बालाजी और एसपी यशवीर सिंह समेत ज़िले के सभी आला अधिकारी पहले घटनास्थल और उसके बाद अस्पताल पहुंचे. घटना में दो अन्य लोग भी गंभीर रूप से घायल हैं जिनका इलाज चल रहा है जबकि कई पुलिसकर्मियों को भी मामूली चोटें आई हैं.

अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार गाजीपुर जनपद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक यशवीर सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के कारण उनके कुछ विरोधी आरक्षण का नाम ले कर शहर में जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे थे जिनको पुलिस प्रशासन ने रोक रखा था. कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब प्रधानमंत्री शहर से चले गए तब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने शहर में कई जगहों पर जाम लगा दिया और रैली से लौट रहे वाहनों पर पथराव करने लगे. हिंसा के दौरान लगे जाम को खुलवाने में जिले के थाना करीमुद्दीन पुर में पदस्थ सिपाही सुरेश वत्स (48) भी लगे हुए थे. पथराव में एक पत्थर सुरेश के सिर में भी लग गया और वह बुरी तरह से जख्मी हो गये. उन्हें तुंरत अस्पताल ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका.

एसएसपी गाजीपुर के मुताबिक इस दौरान करीब 15 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है और वीडियोग्राफी की मदद से अन्य प्रदर्शनकारियों की पहचान की जा रही है. धरना स्थल पर ये लोग हाथों में लाल तख्ती लेकर पहुंचे थे, जिसमें लिखा था, ‘आरक्षण नहीं मिला तो खून बहेगा सड़कों पे।’ उनके इरादों से साफ लग रहा था कि वो कुछ हिंसात्मक कृत्य को अंजाम  देने की मंशा से वहां पर जमा हुए थे और पुलिस ने जब उनके मनसूबो को नाकामयाब  दिया तो उन्होंने पुलिस पर ही हमला बोल दिया. मानवाधिकार की  बेडियो में जकड़े पुलिस वालों ने यथासम्भव इसका प्रतिकार किया लेकिन आख़िरकार एक सिपाही वीरगति पाया . इस घटना  के बाद भी अभी भी पुलिस कर्मियों का ही दोष खोजते कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी वर्ग अपने एकतरफा गतिविधियों से बाज़ आ जायेंगे इसमें कईयों को शक है कि स्वघोषित बुद्धजीवियो द्वारा आगे ऐसा नही होगा इसकी सम्भावना धूमिल ही नजर आ रही ई .

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