इस सवाल का जवाब गिलानी क्या कोई भी आतंकी संगठन नहीं दे सकता ?

न जाने वो कौन सा धर्म और संस्कृति है जो बच्चों को स्कूल भेजने से समाप्त हो जायेगी। अक्सर विवादों में घिरे रहने वाले  कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने अपने बेबुनियाद बयान में कश्मीर की जनता से अपने बच्चों को सेना के  स्कूलों में न भेजने  के लिए कहा  है। गिलानी का मानना है कि इन स्कूलों में पढ़ने से छात्र ‘अपने धर्म तथा संस्कृति से दूर’ हो जाएंगे।उनके इस बयान पर   केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और कांग्रेस ने गिलानी के बयान पर आपत्ति जताई है। जितेंद्र सिंह ने गिलानी से पूछा कि जिहाद उनके ख़ुद के बच्चों  के लिए क्यों नहीं लागू होता है। 
साथ ही उन्होने कहा कि ‘कश्मीरी युवाओं को अलगाववादी नेता से यह सवाल पूछना चाहिए।
इस मामले में कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी सेना का पक्ष लिया और कहा कि जब घाटी किसी भी आपदा का सामना करती हैं। तो आर्मी इनके लिए देवदूत बन जाती है।उस वक्त कोई  भी हुर्रियत की बात नहीं करता, और न ही गिलानी की तरफ से बयान आता है कि हम खुद अपनी रक्षा कर लेंगे। आर्मी को राहतकार्य से दूर रखो। और जब सियासत की चर्चा होती है तो ये आर्मी पर निशाना साधना शुरू कर देते हैं।हमारी सेना का एकमात्र उद्देश्य शिक्षा के स्तर में इजाफा करने की है। इसलिए घाटी में ग्रामीण इलाकों में ऐसे स्कूल खोले हैं।
काफी बड़ी संख्या में स्थानीय छात्रों के नाम रजिस्टर्ड है। गिलानी ने शुक्रवार को एक वक्तव्य में कहा, ‘कि छोटे मोटे भौतिक फायदे को पाने के चक्कर में हमारी पीड़ी अपने धर्म और संस्कृति से भटक जायेगी । सेना के द्वारा चलाये जा रहे स्कुल  हमारे बच्चों को अपने धर्म और विशिष्ट संस्कृति से विरक्त कर रहे हैं।
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के चेयरमैन गिलानी ने कहा कि भारतीय सेना कश्मीरी बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। भारत सरकार देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहती है इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन स्कूलों का संचालन किया जा रहा है।
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