दुर्दांत अपराधी आस मुहम्मद उर्फ़ अब्दुल हक को मार गिराने वाली मुज़फ्फरनगर पुलिस की होगी मजिस्ट्रेटी जांच.. जबकि जान पर खेल कर लड़े थे जांबाज़

वो सभी जांबाज़ जान पर खेल कर लड़े थे.. उस दुर्दांत अपराधी की गोली उन वीरों को भी लग सकती थी जो समाज की रक्षा करने के लिए अपनी छाती को उस हत्यारे , लुटेरे , भगोड़े के आगे लगा दिए थे. उस अपराधी ने गोलियां चला कर शुरुआत की जिसके प्रतिउत्तर में पुलिस ने मजबूरन गोलियां चलाई.. ये आत्मरक्षार्थ फैसला था जिसका निश्चित तौर पर कोई विकल्प नहीं था क्योकि पुलिस ने उस दुर्दांत अपराधी को सरेंडर का पूरा मौक़ा दिया था .. लेकिन उसके सर पर तो खून सवार था ..

खुद अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस अपराधी ने पुलिस पर फायर झोंक दिया था उसने सभ्य समाज को कितनी पीड़ा दी रही होगी . एक ही नहीं बल्कि कई जिलों में उसका खौफ था जिस खौफ से निकलने के लिए एक पूरे ज़ोन के लोग हर पल प्रतीक्षा कर रहे थे .. आख़िरकार ये अपराधी मुज़फ्फरनगर पुलिस से आमने सामने की मुठभेड़ में मारा गया .. मौके के तमाम सबूत और साक्ष्य इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पुलिस ने कितना हाई रिस्क लिया था इस अपराधी से लड़ने में ..

यहाँ ये ध्यान रखने योग्य है कि इस मुठभेड़ में इनामी अपराधी आस मुहम्मद मीडिया, सोशल मीडिया , अधिकारी , मानवाधिकार आदि सभी दबाव से मुक्त था लेकिन पुलिस बल के ऊपर ये सभी दबाव कायम थे .. उसके बंदूक से गोली स्वतंत्र हो कर निकल रही थी जबकि पुलिस बल को पता था कि उनकी एक एक गोली का हिसाब होगा .. इसके बाद आख़िरकार समाज के दृष्टिकोण में एक सुखद अंत हुआ था और अपराधी आस मुहम्मद मारा गया .. पर शायद ये अंत कानूनी दृष्टिकोण से सुखद नहीं था .

अब उसी दुर्दांत अपराधी की मौत पर बिठा दी गई है जांच और जांचा ये जाएगा कि कहीं पुलिस वालों ने फर्जी मुठभेड़ तो नहीं की .. पुलिस से समाज भयमुक्त और अपराध मुक्त सबको चाहिए लेकिन न जाने कौन सा कानून उसे अपराधियों में भय पैदा करने की भी अनुमति नही देता .. सवाल ये है कि क्या पुलिस का नाम बदल कर समाज सुधारक रख देना चाहिए जो अपराधियों को कथा , प्रवचन आदि के माध्यम से सुधारे ? सामने से अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे अपराधी के खिलाफ एक पुलिस वाले के पास केवल 2 विकल्प होते हैं .

पहला कि वो 4 वर्ष से प्रयागराज कचेहरी गोलीकांड में जेल में बंद सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की तरफ आत्मरक्षा करे और जीते जी ही मौत से बदतर सजा काटे.. वहीँ इसी मामले में दूसरा मार्ग ये होता है कि वो शामिल के सिपाही अंकित तोमर की तरह बलिदान दे कर ये साबित करे कि वो जंग सही थी . मुज़फ्फरनगर पुलिस के आगे भी इन्ही दो रास्तो में से एक चुनना था , और वो दोनों मार्ग से गुजरी जिसमे उनके अधिकारी तक को गोली लगी और जवाबी कार्यवाही में अपराधी ढेर हुआ था .

ध्यान देने योग्य है कि जिलाधिकारी/जिला मजिस्ट्रेट अजय शंकर पाण्डेय ने 22 मई 2019 को थाना कोतवाली नगर जनपद मुजफ्फरनगर के क्षेत्रान्तर्गत पुलिस मुठभेड़ के दौरान अभियुक्त श्री आस मौहम्मद उर्फ आशू पुत्र श्री अब्दुल हक उर्फ शरीफ निवासी सरधना जनपद मेरठ की मृत्यू एवं उसके कारणों की मजिस्ट्रीयल जांच हेतु उप जिला मजिस्ट्रेट सदर,मुजफ्फरनगर को जांच अधिकारी नामित किया है.. मतलब अब इस मामले में एक नये सिरे से जांच तब होगी जब मुठभेड़ स्थल से कई सबूत मिट चुके होंगे ..

इसी मामले में उप जिलाधिकारी ने बताया कि जिला मजिस्ट्रेट महोदय के आदेश के अनुपालन में 22 मई 2019 को थाना कोतवाली नगर जनपद मुजफ्फरनगर के क्षेत्रान्तर्गत पुलिस मुठभेड़ के दौरान अभियुक्त श्री आस मौहम्मद उर्फ आशू पुत्र श्री अब्दुल हक उर्फ शरीफ निवासी सरधना जनपद मेरठ की मृत्यू एवं उसके कारणों की मजिस्ट्रीयल जांच मेरे द्वारा की जा रही है। उप जिलाधिकारी ने बताया कि उक्त मजिस्ट्रीयल जांच हेतु 07 जून 2019 की तारीख नियत की गई है..

इस मामले में उन्होने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को उक्त घटना की कोई जानकारी हो तो वह 7 जून को  कार्यालय उप जिलाधिकारी सदर, तहसील सदर मुजफ्फरनगर में उपस्थित होकर अपना लिखित अथवा मौखिक साक्ष्य/अभिकथन प्रस्तुत कर सकता है.. फिलहाल भले ही ये जांच आदि कानूनी रूप से सही हों या कानून के अनुसार तर्कसंगत हों पर इतना सवाल तो बनेगा ही कि मुठभेड़ के समय मौत से जूझने वाली और मुठभेड़ के बाद जांच में उलझने वाली पुलिस किसी से जंग क्यों करेगी ? सवाल ये भी है कि ऐसी जांचो से किस का मनोबल बढ़ेगा ? पुलिस का या अपराधी का ? और किस का मनोबल बढना समाज की शांति और सुरक्षा के लिए उचित है ? आशा है समाज निष्पक्षता से इस मामले पर विचार करेगा और अंत में अपने रक्षक पुलिस वालों के पक्ष में खड़ा होगा न कि हत्यारे , लुटेरे अपराधी आस मुहम्मद जैसे सामाजिक कलंको के साथ ..

 

 

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नॉएडा 

मो0 – 9598805228

  

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