वर्दी का सबसे बड़ा दर्द है “बार्डर स्कीम”.. “सुख से भी दूर , और घर से भी”

पुलिस की नौकरी कभी लगभग हर युवा का सपना हुआ करती थी , जब भी कोई युवा अपनी जवानी में प्रवेश करता था तो उसको अगर कोई सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी, तो वो थी पुलिस की खाकी वर्दी… लेकिन न जाने ऐसी क्या हवा चली है वर्तमान समय में कि एक पुलिस वाला पिता अपने बेटे को पुलिस में भेजने से पहले कई बार सोचता है .. वो अपनी खुद की नौकरी भी अपने जीवन से ज्यादा अपने परिवार वालों के भविष्य को देख कर करता है .. कभी समीक्षा भी नहीं होती उच्च स्तर पर कि ऐसा क्यों है .

अगर बात सरकारों की हो तो जब भी कोई नई सरकार पुरानी सरकार की तमाम प्रकार से निंदा कर के खुद सत्ता में आती है तो वो उन योजनाओं और नियमो को बदलना शुरू करती है जो उसके हिसाब से कल्याणकारी नहीं होती हैं .. ऐसी अनगिनत योजनायें बंद करवाई गई जिस पर नई सरकार पुरानी सरकार से सहमत नहीं थी.. लेकिन अगर बात पुलिस विभाग की हो तो शायद प्रदेश सरकारें तो दूर , केंद्र सरकारें अंग्रेजो तक से सहमत हैं क्योकि अभी भी अंग्रेजो के ही बनाये पुलिस एक्ट से शासन चलाया जा रहा ..

अगर अंग्रेजो से इतना सहमत होना ही था तो उन्हें भगाने का दावा कर के चुनावों में भाग क्यों लिया जाता है .. फिलहाल एक ही नहीं कई बन्दिशो और समस्याओं से घिरे पुलिस विभाग में अगर कोई मुद्दा सबसे ज्यादा पीड़ादायक है तो वो है बार्डर स्कीम .. इसको कहना गलत नहीं होगा कि छोटे स्तर के पुलिसकर्मियों पर रखा गया इतना बड़ा बोझ है ये जो उन्हें ये एहसास दिलाता रहे कि तुम क्या हो और तुम कितने में हो .. इसको लागू करने वाले जानते हैं कि वो कुछ भी नहीं कर पायेंगे ..

पुलिस में बार्डर स्कीम वर्ष 2010 में मायावती संचालित बहुजन समाज पार्टी की सरकार में लागू हुई थी . इसके अनुसार अपने गृह जनपद से सटे जिले में कोई निचले पद पर तैनात पुलिस वाला पोस्टिंग नहीं पायेगा . गृह जनपद के बगल वाले जिले में तैनाती पर रोक लगाने के साथ इसको प्रदेश की कानून व्यवस्था को सुधारने वाला बड़ा कदम बताया गया जबकि ये नियम सबसे ज्यादा उन बेचारे सिपाहियों पर लागू था जो सरकारी आवास, वेतनमान के साथ कई अन्य समस्याओं से पहले से ही जूझ रहे थे .

हैरानी की बात ये रही कि विभाग में सर्वशक्तिमान कहे जाने वाले IPS अधिकारियो पर ये नियम लागू नहीं होता .. मतलब एक बल दिखाया गया निर्बल माने जा सकने वाले कर्मचारियों पर..इस नियम को लागू हुए लगभग 10 वर्ष बीत गये हैं .. इस बीच कई सरकारें कई राजनैतिक पार्टियों की आई और चली गई .. कई नियम बने और बदले .. पर अगर कोई नियम ज्यो का त्यों रहा तो वो है “बार्डर स्कीम” .. क्या इसको ये भी माना जाय कि बार्डर स्कीम भी 18 वीं शताब्दी के पुलिस एक्ट की तरह अब अजर और अमर हो गया है ..

इस नियम को लगाने और बनाने वालों से सवाल तो बनता ही है कि क्या उनके हिसाब से एक सिपाही इतना बड़ा तानाशाह होता है कि वो अपने जिले तो दूर अपने जिले के बगल वाले जिले में भी इतना बड़ा दबदबा रखता है कि उसको काफी दूर रखा जाय ? जबकि मीडिया से ले कर मानवाधिकार की नजर हर पल उनके ऊपर रहती है और कभी कभी फटी वर्दी भी उनके निलम्बन का कारण बन जाती है .. सवाल वर्तमान सरकार से भी बनता है कि पिछली सरकारों की तमाम नीतियों से असहमत रहने वाले मुख्यमंत्री क्या मायावती सरकार के इस नियम से सहमत हैं ? अगर सहमत हैं तो अपने भाषणों में इसकी प्रशंशा क्यों नहीं करते है और अगर उन्हें ये नियम प्रशंसा के योग्य नहीं दीखते हैं तो इसको खत्म करने की पहल क्यों नहीं करते हैं ?

सबसे ज्यादा मानसिक तनाव का विभाग पुलिस विभाग होता है जहाँ एक निचले स्तर के कर्मचारी को अपने अधिकारी से आये दिन डांट सुननी और अपराधियों से मुठभेड़ करनी होती है .. इसके बाद उसको मानवाधिकार और मीडिया को जवाब देना होता है .. घर के झगड़े से ले कर आतंकी हमले का जिम्मेदार भी उसको ही बताया जाता है .. ऐसे में मानसिक शांति की तलाश में भटकता एक वर्दी वाला अंतिम सुकून अपने घर में देखता है और वो भी उस से इतना दूर कर दिया गया.. निश्चित तौर पर ये विचार का विषय है कि थके कंधे और टूटे मनोबल से एक पुलिस वाला किस किस से और कितनी देर लड़ सकता है .. इसलिए अगर बात पुलिस सुधारों की हो तो सबसे पहले उन्हें बार्डर स्कीम से मुक्ति दिलानी होगी .. और शायद यही समाज के रक्षको के साथ सबसे बड़ा न्याय होगा ..साथ ही वर्तमान सरकार को एक बड़ा अवसर है उस सम्भावित गलती को सुधारने का जो पहले की सरकारों ने अपने व्यक्तिगत सोच की पूर्ति के लिए की थी ..   “सुख से दूर करने वालों , घर से दूर मत करो” …

 

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

नॉएडा 

मोबाइल – 9598805228

 

 

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