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शायद कोई और होता तो रुतबे से रौंद देता सिपाही को, लेकिन ये थे IPS सुधीर कुमार, SSP गाजियाबाद

अगर जिला स्तर पर देखा जाय तो पुलिस विभाग में सबसे निचली कड़ी कहा जाता है एक सिपाही और वहीँ SSP सबसे बड़ा पद.. पुलिस विभाग के ढाँचे के हिसाब से SSP जिले में सर्वशक्तिमान होता है जिसकी जिम्मेदारी होती है जिले में कानून व्यवस्था को बनाये और बचाए रखने की.. अगर निचले स्तर पर सुना जाय तो शिकायतों का अम्बार सुनाई देता है लेकिन जब वहीं ऊपर स्तर पर जाया जाय तो जिले भर में होने वाली हर गतिविधि का उत्तरदायित्व पुलिस अधीक्षक का होता है इसलिए उस पद को वही सम्भाल सकता है जिसमे असीमित सहनशक्ति के साथ अद्भुत धैर्य हो ..

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धैर्य न रखने वाले पुलिस अधिकारियो के द्वारा लिए जाने वाले उलटे सीधे फैसलों से न सिर्फ अधिनस्थो में असंतोष फैलता है बल्कि कानून व्वयस्था भी प्रभावित होती है और कभी कभी शासन तक की बदनामी का कारण बनती है.. जिले के पुलिस विभाग में सबसे बड़े पद और उसी पुलिस विभाग के सबसे निचले पद के बीच की दूरी इतनी होती है कि कुछ अधिकारी अपने मन में खुद से खुद का बडप्पन तय कर लेते हैं पर कुछ ऐसे भी हैं जो अपने बडप्पन को अपने कार्यों से सिद्ध कर देते हैं .

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इस दूसरी कैटेगरी अर्थात अपने कार्यों से बडप्पन सिद्ध करने वालो में ही एक हैं वर्तमान समय में SSP गाजियाबाद.. इस से पहले ये SSP मुज़फ्फरनगर थे जिनके सत्कर्म और इनके बनाये न्यायपथ का इनके ट्रांसफर के काफी समय बाद भी अब तक मुज़फ्फरनगर पुलिस अनुसरण कर रही है.. शासन ने जिन उम्मीदों के साथ इनको जिला गाजियाबाद भेजा था वो भी सार्थक होता दिखाई दे रहा क्योकि न ही अपराध और न ही साम्प्रदायिक घटना यहाँ पनप पाई है और यही कभी गाजियाबाद की सबसे बड़ी समस्या थी ..

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ये सब यूं ही सम्भव नहीं हो पाया.. इसके लिए इन्होने खुद को जनता और पुलिस के हर स्तर से जोड़ा.. इनका अनुभव आज सबसे बड़ा रोल अदा कर रहा है इस शांति और सौहार्द के पीछे.. इन तमाम बातो का प्रमाण उस दिन मिला जिस दिन एक सिपाही से इन्होने कांफ्रेंस कॉल पर बात की.. फोन कॉल के दौरान SSP गाजियाबाद सुधीर कुमार सिंह जी ने तत्काल में तो वादी का हित सर्वोच्च का सिद्धांत निभाया तो बाद में सत्यमेव जयते को लागू किया.. उनके  द्वारा किये गये न्याय में न तो कोई द्वेष था और न ही किसी प्रकार का पक्षपात..

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मामला शुरू होता है गाजियाबाद से.. यहाँ रात में SSP को फोन कर के एक व्यक्ति बताता है कि गाजियाबाद का एक सिपाही घूस मांग रहा है.. यद्दपि वो घूस नहीं था फिर भी मामले की गंभीरता को SSP सुधीर कुमार जी ने समझा.. यहाँ सबसे अच्छी गौर करने लायक बात ये है कि एसएसपी ने एक बार भी ये नहीं कहा कि आप SP सिटी , CO या सम्बन्धित इंस्पेक्टर को फोन करिए .. वो खुद इस मामले में फोन लाइन पर आने को तैयार हो गए थे.. ये उनकी गाजियाबाद की जनता के लिए सक्रियता साबित करती है .

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इसके बाद सिपाही लाईन पर आता है और वो संदेह में रहता है कि जिस से बात करवाई जा रही है वो सच में SSP हैं या कोई साजिश उस व्यक्ति की जो पहले से फोन पर साजिश रच रहा था.. सिपाही ने फोन लाइन पर मौजूद एसएसपी को तब तक एसएसपी मानने से इंकार कर दिया जब तक कि वो वायरलेस पर उसकी पुष्टि न कर दें.. यद्दपि एसएसपी ने वो भी किया तब जा कर सिपाही को एहसास हुआ कि उसने असली एसएसपी से बात की थी.. तब तक मामला वायरल हो चुका था..
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यहाँ अगर सिपाही के दृष्टिकोण से देखा जाय तो वो भी गलत नहीं था.. उस व्यक्ति पर उसका संदेह करना जायज था जो पहले ही से साजिश रचे जा रहा था और उसकी साजिश की जद में गाजियाबाद के सिपाही से ले कर एसएसपी तक आ गये थे.. बताया जा रहा है कि साजिशकर्ता नदीम जो वहानो को बेचने खरीदने का काम करता था , उस से एक वाहन का बकाया पैसा मांग रहा था जो जायज़ था और रिश्वत नहीं थी//  सिपाही जिसको रिश्वत का रूप दे कर उसने अर्धसत्य एसएसपी के आगे रखा और आधी अधूरी जानकारी उनके आगे रखी ..

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इसके बाद नदीम ने खुद ही मामले को और भी सनसनीखेज बनाने व सिपाही दीपांशु मलिक को जनता व पुलिस के उच्चाधिकारियों में विलेन बनाने के लिए उस आडियो को वायरल कर के ये संदेश भेज दिया कि सिपाही  घूसखोर के साथ अपने अधिकारियो की नाफ़रमानी करने वाला भी है .. जब एसएसपी ने फोन पर लाईन हाजिर के साथ मौखिक रूप से कहा कि वो उसको सस्पेंड भी करेंगे तो नदीम को लगा कि उसकी साजिश पूरी तरह से कामयाब हो चुकी है … लेकिन कहानी बाकि थी ..

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एसएसपी सुधीर सिंह को लगा कि दाल में कुछ काला है और उन्होंने इस मामले की तह तक जाने का फैसला किया.. निश्चित तौर पर कई ऐसे अधिकारी भी हैं जो अपने मुह से निकली बात को आकाशवाणी मान कर उस पर हर हाल में अमल करवाने पर आमादा हो जाते हैं और उस से पीछे हटना अपने रुतबे की तौहीन समझते हैं, पर इस मामले में एसएसपी गाजियाबाद सुधीर कुमार ने जो रुख दिखाया उसके बाद वो अधिनस्थो और पूरे प्रदेश की पुलिस के एक आदर्श अधिकारी के रूप में स्थापित हो गये हैं .

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आख़िरकार नदीम की पोल गहराई में जाने से खुल गई और उसी नदीम को शांति भंग में चालान किया गया.. सिपाहियों को उनका खोया सम्मान लौटा कर एसएसपी गजियाबाद ने इतना साबित कर दिया कि वर्दी में है तो गलत होगा ही का कूटरचित नियम कम से कम गजियाबाद में नहीं चलने वाला है . जनपद के सभी अधिनस्थो ने ही नहीं बल्कि जनता ने और अन्य विभाग के कर्मचरियों ने भी ऐसे उच्चाधिकारी को एक आदर्श के रूप में माना है ..

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यहाँ कुछ गैर जिम्मेदार लोगों ने और मीडिया के एक वर्ग ने फ़ौरन ही पुलिस की बदनामी का मौका देख कर नदीम को उसी रात सही मान लिया था और अपनी खबरों को आग की तरह वायरल कर दिया था जो अगले दिन जांच के बाद गलत साबित हुई थी.. लेकिन उसके बाद उनकी तरफ से उस सच पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई और मात्र कुछ अख़बारों में एक छोटे हिस्से में वो सच स्थान पाया था जो पहले दिन झूठ के आवरण में ढका हुआ था..

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निश्चित तौर पर एसएसपी गाजियाबाद यहाँ सराहना के पात्र हैं जिन्होंने रुतबे के बजाय न्याय को प्राथमिकता दी और प्रस्तुत किया कई ऐसे अधिकारियो के लिए आदर्श जो सच जान कर भी न्याय नहीं करते और पीछे हटना अपने रुतबे की तौहीन समझते हैं . ऐसा कर के भले ही वो अपना रुतबा बना और बचा लेते हों लेकिन वो सम्मान नहीं पाते हैं जो SSP गाजियाबाद सुधीर कुमार सिंह जी को मिला है .

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

मुख्यालय नोएडा 

मो – 9598805228

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