UP पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते अखिलेश यादव के शासन काल में कुछ ऐसा था पुलिस का हाल

भले ही वर्तमान हालत उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए बेहद चुनौती भरा है लेकिन ऐसा नहीं है कि प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के इन रक्षको के हालात उनके शासन काल में एकदम बेहतर थे जो आज इस मामले को राजनीति का विषय बना कर हंगामा कर रहे हैं . फिलहाल बुलंदशहर की और गाजीपुर की घटना के बाद अगर उत्तर प्रदेश पुलिस के मामले को ले कर योगी सरकार के ऊपर सबसे ज्यादा आक्रामक कोई है तो वो हैं अखिलेश यादव . ये वही समाजवादी पार्टी के मुखिया हैं जो पिछले तमाम एनकाऊंटर में पुलिस के खिलाफ खड़े दिखे और पुलिस के ऊपर सबसे ज्यादा दबाव बनाया .

अगर तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के शासनकाल में पुलिस वालों के हालत कुछ बेहतर नहीं कहे जा सकते हैं . ऐसी ऐसी घटनाए हुई हैं जो शायद पुलिस वालों को आज तक याद होंगी . कहीं पुलिस ने किसी को बेरहमी से प्रताड़ित किया था तो कहीं पुलिस खुद ही बुरी तरह से प्रताड़ित हुई थी . तमाम ऐसी जगह भी थी जहा पुलिस वालों ने तमाम चीजें अपनी आखो से देख कर भी एक्शन के लिए ऊपर से जब आदेश माँगा तो उनके मनमाफिक आदेश नहीं आया था .

इसके अतिरिक्त २ ऐसी घटनाए और हैं जिसमें पुलिस के २ अलग अलग पक्ष दिखेंगे ..लेकिन दोनों ही पक्षों में परोक्ष रूप से सामने आता है अखिलेश यादव का शासन .. पहली घटना है अम्बेडकरनगर पुलिस से जुडी हुई . यहाँ पर एक हिंदूवादी कार्यकर्ता रामबाबू गुप्ता की नृशंश हत्या कर दी जाती है , इतना ही नहीं उनकी हत्या के एकलौते गवाह राम मोहन गुप्ता की कुछ दिन बाद हत्या कर दी जाती है . दोनों हत्याओं में रामबाबू गुप्ता के परिवार वालों ने चीख चीख कर कहा कि समाजवादी पार्टी का विधायक अजीमुल हक जिम्मेदार हैं दोनों हत्याओं का पर अखिलेश यादव के विधायक की वो दहशत थी कि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अजीमुल हक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करना तो दूर , उनसे ठीक से थाने बुला कर पूछताछ तक नहीं की गयी . इतन ही नहीं , लाश पर रोने वाली औरतों पर अखिलेश सरकार में कश्मीरी अंदाज़ में पत्थर बरसे थे और उलटे मृतक के घर वालों पर मुकदमे दर्ज कर दिए गये .. रामबाबू गुप्ता का दोष केवल ये था कि वो मुस्लिम बहुल इलाके में जय श्री राम के नारे लगाते थे और किसी पीड़ित हिन्दू की मदद करने तत्काल चले जाया करते थे . अपने शासन काल की इस घटना पर अखिलेश यादव खामोश रहते हैं जब पुलिस को इतना पंगु बना दिया गया था कि वो २ हत्या के आरोप में एक विधायक से सवाल जवाब भी न कर पाई .

दूसरी घटना है खुद पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर के साथ . उस सब इंस्पेक्टर का नाम था शैलेन्द्र सिंह .  पुलिस सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह का नाम तब चर्चा में आया था जब उनके ऊपर आरोप लगा की उन्होंने इलाहाबाद की जिला अदालत में नबी अहमद नाम के एक वकील को गोली मार दी थी . दहशत कुछ यूं बन गयी थी की खुद शैलेन्द्र सिंह की रिश्तेदारी में पड़ने वाले वकीलों ने भी नबी के समर्थन वाली लॉबी के आगे घुटने तक दिए थे और केस लड़ने से मना कर दिया था .. इस घटना का एक वीडियो सामने आया है जिसमे साफ़ साफ़ शैलेन्द्र सिंह को कई वकीलों से अकेले जूझते देखा जा सकता है और उसमे नबी अहमद नाम के वकील की आवाज साफ़ तेज तेज सुनाई दे रही थी . शैलेन्द्र सिंह के परिवार की माना जाय तो किसी मुकदमे में नबी अहमद के मनमाफिक रिपोर्ट न लगाने के चलते नबी अहमद ने शैलेन्द्र सिंह  को कचेहरी बुलाने का पूरा ताना बना बुना था और जैसे ही शैलेन्द्र सिंह कचेहरी पहुंचे उन पर हमला बोल दिया गया जिसके बाद ये दुर्घटना घटी .. यहाँ ये भी ध्यान रखना जरूरी है की उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी जो घोरतम तुष्टिकरण के चलते अक्सर हिन्दू संगठनों और राष्ट्रवादी वकीलों के निशाने पर रहती थी.

शैलेन्द्र सिंह को आनन् फानन में गिरफ्तार कर लिया गया और मृतक नबी अहमद के परिवार को तत्काल अखिलेश सरकार द्वारा सरकारी सहायता राशि उपलब्ध करवाई गयी . शैलेन्द्र सिंह बार बार कहता रहा की वो राष्ट्रभक्त है और उस की ही जान को खतरा था पर उसकी एक नहीं सुनी गयी और हालात ये हो गए की उसे ना पा कर उसके बदले नबी  अहमद के कुछ बहुत ख़ास लोगों द्वारा एक सिपाही नागर को गोली मारी गयी जिसका विरोध कई राष्ट्रवादी वकीलों ने खुद किया और इस हिंसा को गलत ठहराया .. फिर परिस्थितियां इतनी विषम हो गयी की शैलेन्द्र सिंह को इलाहाबाद जेल में भी रखना उनकी जान के लिए खतरा माना जाने लगा क्योकि सूत्रों से अनुसार मृतक नबी अहमद दुर्दांत अपराधी अशरफ का बेहद ख़ास था जिसका भाई अतीक और वो खुद इस समय योगी सरकार की हिट लिस्ट में है …

शैलेन्द्र सिंह को उनकी जान के खतरे को देखते हुए इलाहाबाद से बहुत दूर रायबरेली जेल में रखा गया , उनका साथ देने जो भी सामने आया उसको अदालत परिसर में बेइज्ज्ज़त किया गया जिसमे IG अमिताभ ठाकुर की धर्मपत्नी नूतन ठाकुर तक शामिल हैं . माना जा रहा है की IG अमिताभ ठाकुर से मुलायम सिंह की तमाम व्यक्तिगत खुन्नस में एक खुन्नस ये भी थी की उनकी पत्नी क्यों इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की किसी भी प्रकार से सहायता कर रही है और इसी के चलते जहाँ अखिलेश यादव ने सब इन्स्पेक्टर शैलेन्द्र पर ढेर सारा जोर लगा दिया था वही मुलायम सिंह यादव जुट गए थे IG अमिताभ ठाकुर के खलाफ अपनी पूरी ताकत से . यद्द्पि IG अमिताभ जी को काफी हद तक राहत मिल गयी पर अभी भी शैलेन्द्र सिंह को न्याय बाकी है. सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह के परिवार के हालात देखें तो अब बेहद दयनीय हालात में पहुंच गया है . उनकी दो बेटियां कभी अपने पिता से मिलने जब जेल में जाती हैं तो वो पुलिस अधिकारी चाह कर भी इसलिए नहीं रो पाता क्योकि उसको पता है की उसके बाद उसकी बेटियां रोयेंगी तब उन्हें बाहर कोई चुप भी करवाने वाला नहीं है .

एक बेटी तो ठीक से जानती भी नहीं पिता का प्रेम क्योकि जब वो महज तीन माह की थी तब से उनका पिता जेल में है . ख़ास कर अल्पसंख्यकों के खिलाफ पुलिस विभाग के हाथ पैर बांध कर रखने वाली पिछली मुलायम सरकार में हुई इस घटना के समय सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह इलाहाबाद के शंकरगढ़ थाने के अंतर्गत आने वाली नारीबारी पुलिस चौकी के प्रभारी थे. शैलेन्द्र सिंह के माता पिता की मृत्य हो चुकी है और उनका एक भाई विक्षिप्त हो गया .  इस प्रकार कभी अपने जिले के सबसे जांबाज़ और तेज तर्रार पुलिस सब इंस्पेक्टरों में से गिना जाने वाला शैलेन्द्र सिंह का पूरा परिवार अब बेहद ही डांवाडोल हालत में है . हालत इतने विषम हैं की उनकी पत्नी श्रीमती सपना सिंह को अपने तीन मासूम बच्चो के साथ अपने पिता के घर रहना पड़ रहा है जहाँ जैसे तैसे इस परिवार  का गुजारा हो रहा है . हालात ये भी हैं की अब तीनो बच्चो की पढ़ाई आदि भी खतरे में पड़ती जा रही है क्योकि सब अपने पति का मुकदमा लड़ते लड़ते इस परिवार का सब कुछ बिक चुका है और यही हाल रहा तो कल खाने के लिए भी दिक्कत पैदा हो जायेगी . अखिलेश सरकार के समय हुई इन घटनाओं का जवाब फिलहाल दिए बिना उनका वर्तमान समय में कानून के रक्षको पर कमेन्ट करना फिलहाल तो न्याय संगत नहीं लग रहा है .

 

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