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इस्लामिक कट्टरपंथियों ने जिम में महिलाओं के जाने के लिए रखी हैं ये शर्तें…


इस्लाम में महिलाओं के लिए कई नियम कानून हैं. जिससे उन्हें पुरुषों के मुकाबले कई कार्य करने की आज़ादी तक नहीं है. जिसके खिलाफ महिलायें आवाज़ उठाती रही हैं लेकिन इस्लाम और शरीया का हवाला देकर उनका मुँह बंद कर दिया जाता रहा है. बावजूद उसके जब महिलाएं अपनी हक़ के लिए उल्लेमाओं के खिलाफ गयी तो उन्हें वे रोज़मर्रा के कार्य करने की आज़ादी तो दी गयी लेकिन शर्तो के साथ और शर्ते भी ऐसी जिन्हें निभाकर वे कार्य करना बेहत मुश्किल होता है.  
ऐसा ही हुआ जब मुस्लिम महिलाओं ने खुद को स्वस्थ रखने के लिए जिम की और रुख मोड़ना चाहा तो उस पर भी मज़हबी ठेकेदारों ने ऐतराज़ जताया और इसे इस्लामिक कानून के विरुद्ध बताया. जिसके बाद देवबंद के मदरसा जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी का कहना है कि मुस्लिम महिलाएं ऐसा कर सकती हैं पर उन्हें कुछ शर्तों का पालन करना होगा.  
मुफ्ती के मुताबिक, जो औरतें शरीर को फिट रखने के लिए जिम जाती हैं, इस्लाम में इसके लिए गुंजाइश हो सकती है. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वहां कोई गैर शरीय अमल ना होता हो. इस्लाम के खिलाफ कोई चीज ना होती हो. वहां पर्दे का भी माकूल इंतजाम होना चाहिए. शर्तों में मुफ्ती ने कहा कि जब औरतें जिम में मौजूद हों तो वहां मर्द की मौजूदगी नहीं होनी चाहिए. साथ ही कोई गाना-बजाना भी नहीं होना चाहिए.  
मुफ्ती ने ये भी कहा कि दो औरतें भी जिम में मौजूद हों तो एक दूसरे की सतर (जिस्म) को ना देखें. इसका अर्थ ये है कि औरतों का एक-दूसरे के सामने भी शरीर का कोई हिस्सा खुला ना हो. मुफ्ती ने कहा कि अगर इन सब बातों का पालन करते हुए महिलाएं खुद को फिट रखने के लिए जिम जाती हैं तो ये मेरे हिसाब से बिल्कुल दुरुस्त होना चाहिए। एक और महिलाओं को मज़हब के नाम पर बांधना फिर जब वे अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाये तो शर्तो को उनके सामने रखना। और इसे आज़ादी का नाम देना। अगर यह आज़ादी है तो गुलामी क्या है?    

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