गोरखपुर में मासूमों की ह्त्या के जिम्मेदार कफील को क्लीन चिट की खबरें चला दी मीडिया ने.. लेकिन सच क्या था वो बताया योगी सरकार ने


वो समय हर किसी को याद होगा जब गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज में आक्सीजन की कमी के चलते बड़ी संख्या में मासूम बच्चो ने दुनिया देखने से पहले ही आँखे बंद कर ली थी. जब अस्पताल से मासूमों के शव निकले तो यूपी ही नहीं देश रो पड़ा था. इस दिल दहला देने वाली घटना क्यों हुई, इसे लेकर आरोपों के घेरे में आया था डॉ. कफील. इसके बाद डॉ. कफील के खिलाफ जांच बिठा दी गई तथा उनको निलंबित कर दिया. उस समय तमाम कथित बुद्धिजीवी डॉ. कफील समर्थन में आ गये थे.

डॉ कफील के खिलाफ जांच चल ही रही थी कि अचानक मीडिया में कल ख़बरें फ्लैश होने लगीं कि कफील को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया है. गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के में 60 बच्चों की मौत के मामले में निलंबित डॉ. कफील खान को विभाग जांच में क्लीन चिट मिल गई है, ऐसी खबर लगभग सभी समाचार पत्रों और वेब पोर्टल पर प्रकाशित की गयी. इन खबरों के सामने आते ही कथित बुद्धिजीवी वर्ग योगी सरकार पर हमलावर हो गया. लेकिन डॉ. कफील  क्लीन चिट की खबरों पर योगी सरकार ने जवाब दिया है.

खबर के मुताबिक़, योगी सरकार ने खुद पत्र जारी कर कफील को क्लीन चिट की खबरों का खंडन किया, जिसके मुताबिक कफील खान को कोई क्लीन चिट नहीं मिली है. सच तो ये है कि डा. कफील पर लगे चार में से दो आरोप सही पाए गए हैं. हालाँकि दो आरोपों में उन्हें दोषी नहीं पाया गया है. उन्हें गोरखपुर मेडिकल कालेज में प्रवक्ता और राजकीय चिकित्सक होते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस करने का दोषी पाया गया है. शासन इन दोनों मामलों में जल्द ही फैसला लेगा. वहीं अनुशासनहीनता और नियमों के उल्लंघन से संबंधित तीन आरोपों के साथ ही विभागीय कार्यवाही अभी चल रही है.

शासन ने डा. कफील को दोषी बताए जाने के साथ ही स्पष्ट किया है कि डा. कफील अहमद खुद को क्लीनचिट देने की भ्रामक व्याख्या कर रहे हैं. अभी भी उनके खिलाफ चल रही विभागीय कार्यवाही में अंतिम फैसला होना बाकी है. डा. कफील अहमद पर आरोप लगा था कि मेडिकल कालेज में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त होने के बाद भी उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस जारी रखी और चिकित्सीय लापरवाही बरती. जांच अधिकारी ने इस आरोप पर लिखा है कि डा. कफील अहमद नियमों और शर्तों का उल्लंघन कर मेडिस्प्रिंग हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर रुस्तमपुर गोरखपुर में प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे थे.

डा. कफील इस आरोप पर समुचित जवाब नहीं दे सके. इस प्रकार उन्हें आरोप में दोषी पाया गया है. कफील पर आरोप लगा था कि मेडिकल कालेज में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त होने के बाद भी उन्होंने प्राइवेट प्रैक्टिस जारी रखी और चिकित्सीय लापरवाही बरती. जांच अधिकारी ने इस आरोप पर लिखा है कि डा. कफील नियमों और शर्तों का उल्लंघन कर मेडिस्प्रिंग हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर रुस्तमपुर गोरखपुर में प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे थे. डा. कफील इस आरोप पर समुचित जवाब नहीं दे सके. इस प्रकार उन्हें आरोप में दोषी पाया गया है.

दूसरी ओर कफील पर नियम विरुद्ध निजी नर्सिंग होम का संचालन करने और मेडिकल कालेज में राजकीय चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस में संलिप्त रहने का आरोप है. उन्होंने सेवा शर्तों का उल्लंघन कर प्राइवेट प्रैक्टिस की. जांच अधिकारी ने लिखा है कि इस आरोप पर भी डा. कफील ने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया. जांच अधिकारी ने लिखा है कि मेडिस्प्रिंग हास्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के संबंध में प्रस्तुत पंजीकरण प्रमाण पत्र 11 नवंबर 2014 से 30 अप्रैल 2015 तक में डा. कफील का नाम चिकित्सक के रूप में दर्ज है. डा. कफील 23 मई 2013 से सीनियर रेजीडेंट के रूप में एनआरएचएम की सेवा शर्तों के अधीन सेवायोजित थे.

24 अप्रैल 2017 को सीएमओ गोरखपुर को भेजे गए नवीनीकरण के शपथपत्र में डा. कफील द्वारा सूचित किया गया था कि मेडिस्प्रिंग हासिप्टल से अब उनका कोई सरोकार नहीं है. इससे यह इंगित होता है कि डा. कफील मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग में प्रवक्ता के पद पर योगदान करते हुए आठ अगस्त 2016 के बाद 24 अप्रैल 2017 तक मेडिस्प्रिंग हास्पिटल एंड रिसर्च सेंचर से जुड़े हुए थे. यह आरोप सिद्ध पाए जाने पर वह दोषी पाए गए हैं.

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अगस्त 2017 में ऑक्सीजन की कमी के कारण 60 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी. इस मामले में डॉक्टर कफील खान को सस्पेंड कर दिया गया था. उन पर सरकारी सेवा में रहते हुए प्राइवेट प्रैक्टिस करने, भ्रष्टाचार और हादसे के दिन अपना कर्तव्य नहीं निभाने के आरोप लगे थे. कफील ने इन आरोपों के लिए 9 महीने जेल में भी बिताए थे. वर्तमान में वह जमानत पर चल रहे हैं तथा निलंबित हैं.

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