नक्सल प्रभावित इलाके में UP पुलिस के सिपाहियों ने जो किया क्या वो गलत था, जिसके बाद उन्ही के विभाग ने उन्ही पर लगा दी धारा 307 ? तुमने बहादुरी क्यों दिखाई महेंद्र ?

खबर लिखे जाने से पहले एक बार उस माहौल की कल्पना कीजिये.. इलाका वो जहाँ कुछ समय पहले नक्सलियों का बोलबाला हुआ करता था और दिन दहाड़े बहा दिया जाता था खून… वो जगह जहाँ कई पुलिस वालों ने अपना खून बहा कर पैदा की हो शांति और सुरक्षा.. समय – रात के लगभग 1 बजे.. एकदम सुनसान इलाका और उस इलाके में अचानक ही इस बाइक तेज गति से सरसराती हुई गुजरे जिसको हाथ दे कर रुकने का इशारा किया जाये वो भी पुलिस द्वारा ..

वो बाइक वाला अपनी स्पीड पुलिस को देखते ही बढ़ा ले.. फिर उसका काफी दूर तक पीछा किया जाय और लगातार चेतावनी दी जाय कि रुक जाओ – रुक जाओ. लेकिन वो मानने के बजाय अपनी स्पीड को बढाता चला जाय … अब बात की जाय पुलिसकर्मियों की .. आधी रात को सुनसान जंगली क्षेत्र कहे जा सकने वाले इलाके में मुस्तैद और हर आने जाने वाले पर नजर रखे हुए.. वहां उस समय न मीडिया के कैमरे थे और न ही शहरी चकाचौंध .. वो चाहते को कही जगह देख कर नींद भी ले सकते थे.. पर वो सतर्क थे ..

उन्होंने काफी दूर पीछा भी किया और लगातार चेतावनी भी दी पर उधर से रुकने के बजाय स्पीड बढती गई .. वो बाइक किसी के घर पर हमला करने के उद्देश्य से भी जाना सम्भव थी, उस बाइक में हथियार आदि भी सो सकते थे जो किसी ने नरसंहार में प्रयुक्त हो सकते थे.. उस बाइक में नशे आदि की चीजें भी हो सकती थी जो एक क्षेत्र में युवाओं के लिए जहर का काम करती .. निश्चित तौर पर एक आम नागरिक के रूप में विचार कीजिए तो खुद से जवाब मिल जाएगा कि पुलिस का क्या कर्तव्य होना चाहिए थे ..

जिस क्षेत्र में कुचल दिए गये नक्सली आये दिन फिर से अपने सर को उठाने की कोशिश कर रहे हो उस क्षेत्र की खाकी के मनोबल पर फिर से वार किया जा रहा है . ये मामला मिर्जापुर का है जहाँ भले ही कुछ लोग इस घटना को वाहन चेकिंग का नाम दे रहे हो पर यहाँ व्यक्ति चेकिंग का विषय था जो रात के 1 बजे बदहवास अंदाज़ में बाइक चलाता जा रहा था .. पुलिस ने ये भी जानना चाहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसको कोई समस्या हो जिसका हल पुलिस के पास हो .. लेकिन उसने अपनी संदिग्ध हरकत से पुलिस को पीछा करने पर मजबूर कर दिया ..

मामला रविवार का है और थाना सोनभद्र का करमा है ..यहाँ पर दो सिपाहियों ने बाइक सवार को लगातार चेतावनी दी रुकने की और काफी दूर तक पीछा किया लेकिन वो रुकने के बजाय बाइक को और स्पीड में बढाता चला गया. उसकी बाइक के टायरों को पंचर करने के लिए गोली मारी गई पर वो जिस अंदाज़ में अपनी बाइक को सडक पर आड़ी तिरछी घुमा रहा था उसके चलते गोली उसके पैरों में लगी और वो घायल हो गया .. ये जगह करकी माइनर बरम बाबा मंदिर के पास की है ..

यहाँ ये भी ध्यान रखने योग्य है कि इस घायल को खुद उन्ही पुलिस वालों ने अस्पताल पहुचाया जिनके ऊपर अब कुछ लोग सिर्फ पुलिस वाला होने के नाते टूट पड़े हैं .. यदि पुलिसकर्मियों की मंशा युवक को सच में हानि पहुचने की होती तो वो उसको खुद से अस्पताल क्यों पहुचाते .. युवक का नाम रविन्द्र कोल है जिसका इलाज इस समय वाराणसी में हो रहा है .. इतना ही नहीं युवक के घर वालों को खुद पुलिस वालों ने ही सूचना भिजवाई जो उनकी उस मंशा को स्पष्ट करता है जिसे बताया नहीं जा रहा है .. अब तक इस मामले में सिपाही गुलशन, सिपाही महेंद्र का नाम आ रहा है ..

इस मामले में अचानक ही पुलिसकर्मियों को दोषी बताया जाने लगा . आतंकवाद और नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने की मांग करने और प्रदेश को अपराध मुक्त करने के लिए प्रदर्शन करने वालों ने ऐसे शोर मचाना शुरू कर दिया जैसे पुलिस कर्मियों ने किसी को उसके घर से उठा कर गोली मार दी . किसी ने भी उस समय के हालात और स्थिति की बात नहीं की और आसान शिकार “खाकी” वो भी अराजपत्रित स्टाफ के शिकार में लग गये, बिना ये कल्पना किये कि उस समय पुलिसवालों के पास विकल्प क्या थे ?

पहिचान होने के बाद पता चला कि वो रविन्द्र था अन्यथा वो एक संदिग्ध ही था.. आधी रात में कई किलोमीटर पीछा करने और बार चेतावनी देने पर भी न रुकने वाले को पुलिस छोडिये , एक आम व्यक्ति क्या मानेगा ? क्या पुलिस वाले वो जो भी होता , उसको जाने देते ? क्या अब पुलिसकर्मियों को अन्तर्यामी होने की भी ट्रेनिंग मिलेगी जिसमे वो आँख बंद कर के जान जायेगे कि सामने से गुजर रहा व्यक्ति दोषी है या निर्दोष ? या अंतिम में ये कहा जा सकता है कि अब – UP पुलिस में बहादुरी दिखाना गुनाह है ? 

सम्भव है कि दबाव बना कर उन पुलिसकर्मियों को दोषी ठहरा दिया जाय जिन पर फ़ौरन ही उनके अधिकारियो ने धारा ३०७ के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया जबकि उन्हें भी पता है कि ये घटना उन पुलिसकर्मियों के किसी व्यक्तिगत स्वार्थ , लाभ या लालच के लिए नहीं बल्कि समाज की रक्षा को ध्यान में रख कर घटी है. संदिग्ध हरकत करने वाले रविन्द्र से व उसके परिवार वालों से पुलिस वालों को आज भी हमदर्दी है लेकिन अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करने वाले पुलिसकर्मियों से किसी को जरा सा भी लगाव क्यों नहीं ?

जहाँ तक निष्पक्षता से सोचा जाय तो ये घटनाक्रम बढ़ावा देखा रात के अँधेरे में अपराध करने की कोशिश करने वाले असामजिक तत्वों को जो ये सोचेंगे कि उन्हें रोका गया तो उनके साथ बहुत लोग खड़े हैं और रोकने वाला ही जेल जायेगा .. भले ही कथित रूप से एक आसान का शिकार आराम से कर लिया जाय और अब उन सिपाहियों को भी लखनऊ का प्रशांत या प्रयागराज का सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह बना दिया जाय पर इसका असर समाज की रक्षा और सुरक्षा में मुस्तैद पुलिसकर्मियों पर जरूर पड़ेगा जिनमे इतना सब देख और झेल कर भी जज्बा बचा हुआ है अपराध को अपनी आँखों के आगे न होने देने का..

 

रिपोर्ट –

राहुल पाण्डेय 

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज 

मुख्यालय नोएडा 

मोबाइल – 09598805228 

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