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जुमे की नमाज़ के बाद हुआ एलान- “वो फिल्म चली तो धूं धूं कर जलेंगे सिमेमाघर”

ये जगह कश्मीर नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश है .. ये धमकी क्या नहीं मानी जा सकती है सीधे सीधे सरकार और प्रशासन को एक चुनौती के रूप में ? इस पहले भी कई फिल्मो का प्रदर्शन हुआ जो विवादित थीं जिसमे फायर , वाटर , PK जैसी तमाम अन्य भी. इसको अभिव्यक्ति की आज़ादी बता कर बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने इसका पूरा समर्थन किया और इसका विरोध करने वालों को कट्टरपंथी और न जाने क्या क्या कहा .. लेकिन अब अचानक एक अन्य मामले में वही सब बुद्धिजीवी खामोश हो गये हैं .

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यहाँ सबसे बड़ा सवाल बॉलीवुड के उन तमाम नामो और चेहरे से भी है जो अपने ट्विटर हैंडल पर ऊँगली रख कर बैठे रहते हैं उस समय की ताक में जब कोई विरोध हिन्दू समाज कर रहा होता है.. तिल का ताड़ बनाने वाले मीडिया के एक वर्ग को सिनेमाघर को जला देने की धमकी भी क्यों नहीं सुनाई दे रही है ये सोचने का विषय जरूर है. ध्यान देने योग्य है वसीम रिज़वी द्वारा बनाई गई फिल्म के खिलाफ अभी से तमाम मुस्लिम संगठन लामबंद हो गये हैं और उन्मादी रूप भी दिखाने लगे हैं .

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ये धमकी दी गई है उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में जहाँ अभी समाजवादी पार्टी के सांसद हसन ने भाजपा प्रत्याशी को हरा कर जीत दर्ज की है . हजरत आयशा के किरदार को लेकर बनी फिल्म के खिलाफ जुमे की नमाज के बाद मुसलमानों ने सड़क पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया। भावनाओं को भड़काने वाली फिल्म के रिलीज होने पर सिनेमाघरों में आग लगाने की चेतावनी दी। यद्दपि इतनी गंभीर चेतावनी के बाद भी अब तक प्रशासन ने उन सभी के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया है .

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शहर की जामा मस्जिद से जुमे की नमाज के बाद जुलूस की शक्ल में मुस्लिम समाज के लोग शिया वक्फ बोर्ड चेयरमैन वसीम रिजवी के खिलाफ नारेबाजी करते जामा मस्जिद चौराहा पर पहुंचे। जहां पर पहले से मौजूद अफसरों को राष्ट्रपति को संबोधित मेमोरेंडम सौंपा। उन्होंने फिल्म पर तत्काल पाबंदी लगाने वसीम रिजवी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर बोर्ड चेयरमैन के पद से बर्खास्त करने की भी मांग की। प्रदर्शन में सलीम अहमद बाबरी, शुएब पाशा, सलीम वारसी, मुस्तफा हुसैन आदि मौजूद थे।

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