हत्यारे, लुटेरे शहाबुद्दीन का वो काला इतिहास, जिसके चलते उसे कहा गया बिहार का कलंक

बिहार का सिवान जो कभी इसलिए चर्चा में रहा क्योंकि भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जन्मस्थली है वहाँ, पर अब बिहार का सिवान इसलिए चर्चा में रहता है क्योकि वहाँ का एक बहुबली है जिसके आतंक का खौफ अभी भी व्यापत है बिहार में। वो बिहार जो गवाह है 15 साल जंगल राज का, वो बिहार जो जातिवाद राजनीति का परिचारक रहा है पुरे हिंदुस्तान में। शहाबुद्दीन खौफ का दूसरा नाम हुआ करता था लालू के सरकार में पूर्वी बिहार में इसके खौफ का अंदाजा आप इसी से लगा सकते है की इकलौता बाहुबली अपनी तरफ का और हमेशा चुनाव जीतता था।

खौफ ऐसा की जेल में रहने के बाद भी अपनी बीवी को खड़ा करता है। जो सिवान कभी राजेंद्र प्रसाद का गवाह था। उसके प्रयाय बदले, उसके रंग बदले, उसके ढंग बदले, 90 के दशक की शुरुआत में सीवान की एक नई पहचान बनी। उस पहचान का नाम शाहबुदीन था। जिसने सिवान नाम से ही खौफ पैदा कर देने का माहौल बनाया। अब वो नाम ,वो शख्स जेल में है जिसपर स्थानीय पत्रकार राजदेव रंजन की दर्दनाक तरीके से हत्या का आरोप है। शाहबुदीन वो व्यक्ति था जिसने अपराध की दुनिया से राजनीति में कदम रखा और पूरे प्रदेश की सियासत को बदल कर रख दिया।
10 मई 1967 को सीवान जिले के प्रतापपुर में जन्मे और बिहार से ही पॉलिटिकल साइंस में एमए और पीएचडी करने वाले शहाबुद्दीन ने कॉलेज से ही अपराध और राजनीति की दुनिया में कदम रख दिया था।मात्र 19 साल की उम्र में शहाबुद्दीन तब चर्चा में आया था, जब 1986 में उनके खिलाफ पहली बार आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था। इस बाहुबली को जल्द ही पुलिस ने सीवान के हुसैनगंज थाने में ए श्रेणी का हिस्ट्रीशीटर घोषित कर दिया। उस वक़्त लालू का राज था बिहार पर और खौफ का प्रयाय बाहुबली को लालू का विश्वाश हासिल था। आरजेडी सरकार के संरक्षण में शहाबुद्दीन सीवान को अपनी जागीर समझने लगा और उसके बिना क्षेत्र का एक पत्ता भी नहीं हिलता था।
सिवान के लोग शहाबुद्दीन के नाम से ही कांप उठते थे। जब कानून तोड़ने वाला ही कानून बनाने लग जाए तो क्या हो, और आखिर यही हुआ। शहाबुद्दीन के खौफ के सामने प्रशासन ने घुटने टेक दिए। अरूप यहाँ तक लगते है की राजद को खुद की जागीर समझता था ये बाहुबली या यु कह ले की सत्ता लोभ में राजद को इसकी गुंडागर्दी दिखती थी। शहाबुद्दीन सिवान से चार बार MP और दो बार MLA रह चुका है। शहाबुद्दीन को अपनी ताकत और दबंगई का फायदा मिला और पार्टी ने 1990 में विधानसभा का टिकट दिया। शहाबुद्दीन ने जीत हासिल की और पहली बार जनता दल के टिकट पर उस समय के सबसे कम उम्र के जनप्रतिनिधि के रूप में विधानसभा पहुंचा। दोबारा उसी सीट से1995 के विधानसभा चुनाव में भी जीत दर्ज की।
पार्टी ने 1996 में उन्हें लोकसभा का टिकट थमा दिया और एक बार फिर शहाबुद्दीन ने परचम लहराया। 1997 में राष्ट्रीय जनता दल के गठन और लालू यादव की सरकार बनते ही शहाबुद्दीन की ताकत पहले से कई गुना ज्यादा हो गई और आतंक का दूसरा नाम ही शहाबुद्दीन हो गया।2004 में चुनाव से ठीक 8 महीने पहले इस बाहुबली को 1999 में एक सीपीआई (एमएल) कार्यकर्ता के अपहरण और संदिग्ध हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया। कहा जाता है कि अपने राजनीतिक पहुंच का फायदा उठाते हुए चुनाव आते ही शहाबुद्दीन ने मेडिकल आधार पर अस्पताल में शिफ्ट होने का इंतजाम कर लिया जहां वह कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर न सिर्फ चुनाव तैयारी की समीक्षा करता था बल्कि भारी सुरक्षा के बीच वहीं से फोन पर वह अधिकारियों, नेताओं से अपने काम भी करवाता था।
2004 के चुनाव के बाद इस बाहुबली का बुरा वक्त शुरू हो गया जब शहाबुद्दीन के खिलाफ राजनीतिक रंजिश के बढ़ते मामलों के बीच कई मामले दर्ज किए गए।नवंबर 2005 में जब बिहार में राष्ट्रपति शासन का दौर था, पुलिस की एक विशेष टीम ने दिल्ली में शहाबुद्दीन को उस वक्त दोबारा गिरफ्तार कर लिया था जब वह संसद सत्र में भागीदारी करने के लिए यहां आए हुए थे। अदालत ने 2007 के एक मामले में सजायाफ्ता शहाबुद्दीन को 2009 में चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी, हालांकि उस वक्त लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने पर्चा भरा लेकिन चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पाई। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इस हार के बाद शहाबुद्दीन के कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ भाटापोखर गांव में रहने वाले पंचायत मुखिया हरिंदर कुशवाहा को सरकारी कार्यालय में ही गोलियों से छलनी कर हत्या कर डाली बल्कि इसके बाद जेडीयू नेता ओमप्रकाश यादव के घर पर ताबड़तोड़ सैकड़ों राउंड फायरिंग कर पूरे घर पर गोलियों के निशान बना डाले।
2005 के अप्रैल महीने में तत्कालीन डीएम सीके अनिल और एसपी रत्न संजय ने शहाबुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई किया। शाहबुदीन के पाप का घड़ा भर गया था। सबसे ज्यादा उसे तेजाब कांड ने दिक्कत किया। तेजाब कांड के आरोप में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा दीया जा चूका था पर इस फैसले के खिलाफ उसने पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया । 2004 में 16 अगस्त को अंजाम दिए गए इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के एक व्यवसायी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों सतीश राज (23) और गिरीश राज (18) को अपहरण के बाद तेजाब से नहला दिया गया था, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी।
इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह चंदा बाबू के सबसे बड़े बेटे राजीव रोशन (36) थे लेकिन मामला की सुनवाई के दौरान 16 जून, 2014 को साढ़े आठ बजे रात में अपराधियों ने राजीव की गोली मारकर हत्या कर दी। जिसके बाद मीर्तक की माँ ने तहरीर दिया। जिसके फैसले में सिवान की विशेष अदालत ने इसको उम्र कैद की सजा सुनाई थी। सहाबुद्दीन के ऊपर करीब तीन दर्जन से अधिक मामले दर्ज हैं। ट्रायल कोर्ट के गठन के बाद 12 मामलों का फैसला आ चुका है जिसमें आठ मामलों में एक साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो चुकी है। आज पटना हाई कोर्ट ने उस दुर्दांत खौफ का मंजर रचने वाले शाहबुदीन के सजा को बरकरार रखा है। पटना की उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए अपराधी शहाबुद्दीन की आजीवन कारावास की सजा को बरक़रार रखते हुए कानून को खिलौना समझने वाले इस हत्यारे को कानून के असली स्वरूप के दर्शन करवा दिए। कानून ने उस दुर्दांत को उसकी असली औकात दिखा दी। कानून के दर पर देर है अंधेर नहीं।  
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