राष्ट्रपति चुनाव कईयों को मिला रहा है तो कईयों को कर रहा है अलग. जानिए पूरा विवरण…

रामनाथ कोविंद पर विपक्ष बंटा हुआ है ये सभी जानते हैं। जिस तरह से नीतीश ने राष्ट्रपति के चुनावों के लिए अलग सुर लगाये इससे साफ़ पता चलता है कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। जिस सरकार की नींव ही झुठ और भ्रष्टचार पर खड़ी हो उसके ज्यादा दिन तक टिक्के रहने की उम्मीद लगाना भी बेईमानी हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि विपक्षी एकता ही नहीं, वैकल्पिक एजेंडा तय होना चाहिए और हम इस बात की वक़ालत हमेशा से करते रहे है। 
उन्होंने कहा कि हमारा एजेंडा क्या है जनता के सामने रखना होगा, तभी वह प्रभावकारी होगा और लोगों तक पहुंच पायेगा, अकेले हम सिर्फ एकता या चेहरे की राग अलापे वह उतना प्रभावकारी नहीं होगा। सिर्फ एकता की बात करना ही काफी नहीं है। उसे जमीनी पटल पर उतरना भी जरुरी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ गठबंधन बनाने से कुछ नहीं होगा। गठबंधन दिली होना भी जरुरी है। 2019 में मैं विपक्ष का पीएम पद का दावेदार नहीं हूं, लेकिन कांग्रेस को एक एजेंडा तय करना होगा। नीतीश ने कहा कि हमारा असल उद्देश्य वादों को पूरा करना है। जनता को काम दिखाना हैं। वो प्रधानमंत्री पद के लालची नहीं हैं। 
उन्होंने आगे ये भी जोड़ते हुये कहा कि जब मौजूदा राष्ट्रपति पी चिदंबरम ने अपनी किताब के विमोचन पर बुलाया तो पैनल डिसकशन के बारे में मुझे बताया भी नहीं गया था। उसमें भी हमसे पूछा गया तो हमने स्पष्ट कहा कि एजेंडा तय करें। विपक्ष की मजबूती के लिए जरूरी है कि हम अपने एजेंडा के साथ आगे बढ़े जिसमें सबकी सर्वसहमति हो। चिदंबरम के कार्यक्रम में भी मैंने राहुल गांधी से कहा था कि आप बड़ी पार्टी हैं, एजेंडा तय करें। सिर्फ बोलने या प्रतिरोध से कुछ नहीं होता, उसका विकल्प क्या है, ये बताना चाहिए। 
जहां तक राष्ट्रपति चुनाव की बात है तो अलग-अलग पार्टी के अलग-अलग विचार होते हैं अलग-अलग नज़रिये होते है। हमारा विचार उनसे अलग है। किसी के ऊपर किसी का नज़रिया नहीं थोपा जा सकता। कांग्रेस पर हमला बोलते हुए उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रपति चुनाव के मामले को इस कदर तूल दिया गया कि किसानों का मुद्दा पीछे छूट गया। जीएसटी पर नीतीश ने कहा कि इस पर यूपीए के समय से काम हो रहा है। एक टैक्स से इस व्यवस्था को चलाना आसान होगा। इससे टैक्स चोरों पर लगाम लगेगी। हम पहले भी इसके हिमायती रह चुके हैं अब भी इसके पक्ष में हैं। सरकार बदल जाने से हमारे सुर नहीं बदलेंगे। इन तमाम बातों से तो साफ़ समझ आ रहा है की ये मिल बाँट के खाने वाली मिलीझुली सरकार ज्यादा देर तक नहीं चलने वाली। देखना दिलचस्प होगा की इनके कब्र में आखरी किल कब ठुकता है। 
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