पासपोर्ट के मामले में गाजियाबाद पुलिस नही बल्कि अदालत ने गंभीरता दिखाई.. योगी शासन में ऐसी प्रशासनिक कार्यशैली एक बदनुमा दाग


ये वही गाजियाबाद है जो भारत की राजधानी दिल्ली से सटा हुआ है, यही वो जगह है जहाँ से दिल्ली में कोई सामान्य या संदिग्ध आ या जा सकता है . यहाँ सुरक्षा के उच्चतम स्तर की आशा न सिर्फ गाजियाबाद और दिल्ली के निवासी करते हैं बल्कि इसकी उम्मीद पूरा देश करता है क्योकि यहाँ हुई चूक सीधे सीधे दिल्ली को प्रभावित कर देने लायक घटना मानी जा सकती है .. लेकिन क्या यहाँ पर सतर्कता उस स्तर की है जैसी होनी चाहिए ? क्या यहाँ का प्रशासन उस आपेक्षित स्तर का आधा भी सतर्क है ?

अगर जो घटनाए गाजियाबाद में कुछ समय में घटी हैं उसको देखा जाय तो जवाब मिलेगा कि किसी भी हालत में नहीं .. अगर इसमें गौर किया जाय तो दिल्ली का सीमान्त थाना साहिबाबाद है और वहीँ से बार बार कुछ ऐसा होता है जो सनसनीखेज होता है . अभी कुछ समय पहले ही उसी क्षेत्र से एक अवैध रूप से रहता अफगानी पकड़ा गया था.. एक लम्बा समय बिताने के बाद भी किसी को भनक भी नहीं लगी थी कि एक विदेशी अवैध रूप से एक क्षेत में रहता है …

इसी के बाद अब एक और मामले ने किरकिरी करवाई है गाजियाबाद पुलिस की जिसमे एक महिला का पासपोर्ट फर्जी कागजात से बनवाने के मामले में अदालत ने संज्ञान लिया है.  महिला के बारे में तमाम तरह की बातें की जा रही हैं जिसका पूरा खुलासा जल्द ही सुदर्शन न्यूज पूरे प्रमाणों से करेगा लेकिन उस से भी बड़ा सवाल ये है कि आखिर वो कौन सा दबाव था जिसके चलते सभी सबूतों को अपने मेज पर देख कर भी गाजियाबाद पुलिस हिम्मत भी नहीं कर पाई थी एक भी कदम आगे बढने की ..

ध्यान देने योग्य है कि उक्त महिला के ऊपर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक के खिलाफ अभद्र भाषा प्रयोग करने के आरोप तक हैं लेकिन गाजियाबाद पुलिस तब नींद से जगी जब ग़ाज़ियाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने काग़ज़ों में हेराफेरी कर पासपोर्ट बनवाने के मामले में FIR के आदेश जारी किये .. मतलब एक गंभीर अपराध के बाद भी कम से कम गाजियाबाद में एक व्यक्ति आराम से तब तक रह सकता है जब तक उसके खिलाफ अदालत से आदेश न ले आये जाएँ ..

इतनी लम्बी कनूनी प्रक्रिया में उस व्यक्ति के फरार होने या अन्य किसी बचाव् के रास्ते पकड़ने की पूरी छूट जैसी ही मानी जायेगी ये जो तथाकथित विशेषाधिकार के रूप में गाजियाबाद पुलिस देती दिखाई दे रही है . इस मामले में अधिक जानकारी देते हुए अधिवक्ता उमेश भारद्वाज ने बताया की वादी प्रशांत ने उक्त महिला के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी तरीक़े से पासपोर्ट बनवाने के मामले में पासपोर्ट कार्यालय व ग़ाज़ियाबाद और SSP को दी थी शिकायत , लेकिन कोई कार्यवाही ना होने पर प्रशांत ने न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया न्यायालय ने FIR पंजीकृत करने के आदेश दिये. अब सवाल ये उठता है कि क्या पासपोर्ट जैसे मामले में किसी गंभीर शिकायत के लिए गाजियाबाद की आम जनता पहले अदालत जाए और सीधा वही से आदेश लाये …

इसी महिला के मामले में कई अन्य सवालों के जवाब भी गाजियाबाद पुलिस को देने होंगे जो आने वाले समय में उसके गले की फांस भी बन सकते हैं .. फिलहाल अदालत के आदेश के बाद भी गाजियाबाद पुलिस अभियुक्त को गिरफ्तार करती है या पहले की तरफ अपने कानूनी बचाव का पूरा मौक़ा देती है ये सबसे बड़ा सवाल है . फिलहाल गाजियाबाद पुलिस का इस मामले में ऐसा वर्ताव और कार्यवाही का स्तर पूरे प्रदेश के अपराधियों को गाजियाबाद की तरफ कूच करने का मन बनवा सकता है जहाँ पुलिस दोषी को पूरा मौका और पूरा समय देती दिखाई दे रही है ..


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