जो अपनी पार्टी का न हुआ वो श्री राम का क्या होता? वो पार्टी जिसने उन्हें “विरोषाधिकार” दिलाया

शरद यादव राजनीती में एक लम्बे अरसे से हैं। लेकिन ज्यादातर वह अपने विवादित बयानों को लेकर सुर्खिओ में बने रहे हैं. बेटिओ की इज़्ज़त को वोट से काम बताने वाले शरद यादव अपने बयानों से बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को कई बार मुश्किलों में डाल चुके हैं. लेकिन एक पार्टी के होने के कारण नितीश कुमार हमेशा उनके बचाव में उतरे हैं लेकिन जब आज नितीश ने जब भ्रस्ट लालू और राहुल का साथ छोड़ बिहार की उन्नति के लिए भाजपा से हाथ मिलाया तो शरद यादव उनसे खफा हो गए और पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया हैं ।

दरसल, मुख्यमंत्री एवं जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है जिसमें श्री शरद यादव को भी शामिल होने के लिए न्यौता दिया गया था लेकिन बागी हुए शरद यादव ने कल पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जाने की बजाय पटना में ही समानांतर बैठक की घोषणा की है जिससे जदयू में टूट तय मानी जा रही है.
वैसे भी महिलाओं के खिलाफ अभद्र बयान और कावंड़ियों को निठल्ला कहकर उनकी आस्था का मज़ाक उड़ाने वाले शरद यादव का भाजपा जैसी पार्टी के साथ जुड़ना मुश्किल इसलिए भी हैं क्यूंकि भाजपा की सोच शरद यादव की महिलाओ और आस्था के प्रति सोच से दूर दूर तक नहीं मिलती हैं.    
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