कम्युनिस्टों ने फिर किया है घिनौना पाप. मां सरस्वती पर की अभद्र टिप्पणी….

अगर कोई युवक मज़हब के बारे में कुछ टिपण्णी या फेसबुक पोस्ट करता हैं तो बंगाल में दंगे हो जाते हैं, अगर कोई कार्टून बनाता है तो पेरिस में आतंकी हमले  हो जाते हैं। आतंकी संघठन सर कलम करने की धमकी देने लगते हैं, मज़हबी ठेकेदार इनाम देने तक की घोषणा करने लगते हैं। कुछ राजनितिक पार्टियां राजनीति करने लगती हैं। मज़हब की तौहीन न करने की बाते करती हैं। सभी मज़हबों को एक समान मानने की बाते करते हैं। लकिन जब कोई सोशल मीडिया पर हिन्दुत्व का मज़ाक उडाता हैं तो सिर्फ ट्वीट करके उसकी कड़ी नींदा की जाती हैं। कभी-कभी तो ट्वीट करने की ज़रूरत भी नहीं समझी जाती। 
इस बार केरल में SFI यानि स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया ने माँ सरस्वती जिन्हें ज्ञान की देवी कहा जाता हैं, जिन्हे पूजा जाता हैं, उनका नग्न चित्र बनाया,  माँ सरस्वती का अपमान किया। इसके जवाब में कुछ आम लोगों ने ट्वीट करके अपनी नाराज़गी जताई। शायद समाज में हिन्दुत्व के इतने मायने नहीं रह गए हैं इसलिए किसी भी राजनितिक पार्टी या दल ने कुछ करना तो छोड़िये कहना तक ज़रूरी नहीं समझा। 
यहां पर सवाल यह उठता है कि अगर कोई हिंदुत्व के अलावा किसी और मज़हब के बारे में छोटी सी टिपण्णी कर दे तो वो मज़हब की तौहीन है लकिन हिंदुत्व के बारे में कोई कुछ भी कहता रहे वो उनकी निजी राय क्यों कहलाती हैं? जब हिंदुत्व की बात आती है तो कहां चले जाते हैं वे लोग जो सभी मज़हबो को एक समान इज्जत देने की बातें करते हैं? क्या आवाज़े उठाने का फैशन हिंदुत्व के अलावा बाकि मज़हबो के लिए ही हैं?      
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