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सिर्फ कहने भर के लिए वो एक मिशनरी स्कूल था….जबकि असल में वो था कुकर्म का अड्डा….देखिये क्या होता था वहां

हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले जिसके लिए वो अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे महँगी फीस वाले स्कूल में प्रवेश दिलाता है . लेकिन सोचिये कि स्कूल प्रबन्धन बच्चों को शिक्षा देने के बजाय उनके साथ दुराचार करे तो क्या वो स्कूल स्कूल कहा जायेगा और जिस स्कूल मैं बच्चों के साथ ऐसी घटनाएँ घटें तो क्या वो स्कूल देश के भविष्य के निर्माण के लिए युवाओं को तैयार कर पायेगा? जवाब होगा नहीं.

एसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले के थाना बन्ना देवी क्षेत्र के जीटी रोड स्थित मिशनरी ग्राहम इंस्टिट्यूट से आया है जहाँ होस्टल वार्डन चन्द्र मसीह ने कक्षा 2-3 और 4 मैं पढने वाले तथा वहीं होस्टल मैं रहने वाले 3 सगे भाइयों को नशीला पदार्थ खिलाकर न केवल स्वयं दुराचार किया बल्कि उनके सीनियर छात्रों द्वारा भी उन मासूम बच्चों के साथ अप्राकृतिक कृत्य कराया. जब बच्चों ने इसकी जानकारी अपनी माँ को दी तो उन्होंने स्कूल आकर इसकी शिकायत की तो स्कूल प्रबन्धन ने इस अमानवीय घटना पर कोई उचित कार्यवाही करने के बजाय मामले को रफा दफा करने की कोशिश की.

पीड़ितों की माँ का आरोप है कि स्कूल प्रबन्धन ने वार्डन से मिलकर पहले ही उन बच्चों को होस्टल तथा स्कूल से बहार निकाल दिया ताकि मामला तूल न पकड़े.. स्कूल प्रशासन की तरफ से वार्डन तथा अन्य आरोपियों पर कोई कार्यवाही न होने पर बच्चों की माँ ने पुलिस मैं शिकायत दर्ज कराई है. जानकारी लेने पर एसपी सिटी श्री अतुल कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि हाँ एसा मामला संज्ञान मैं आया है व् पुलिस जांच कर रही है. पुलिश प्रशासन ने भरोसा दिलाया हैं की जाँच में दोषी पाए जाने पर वार्डन चन्द्र मसीह व अन्य सभी आरोपियों पर सुसंगत धाराओं मैं कार्यवाही की जाएगी.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो जिस मिशनरी स्कूल में अभिभावक महँगी फीस देकर अपने बच्चों को पढने के लिए भेजते हैं उस स्कूल का वार्डन ही जो वहां एक तरह से बच्चों का अभिभावक होता है, स्वयं बच्चों का अप्राकृतिक यौनाचार करे तो उन बच्चों व अभिभावकों की मनोदशा क्या होगी? क्या वो बच्चे दिमागी रूप से आगे बिन किसी तनाव के बिन किसी लज्जा के अपनी पढ़ाई जारी रख पाएंगे? और क्या इसे स्कूलों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाना चाहिए जहाँ क्षत्रों के साथ ही अप्राकृतिक यौनाचार होता हो ताकि भविष्य मैं ऐसी घटनाएँ न हों व बच्चों के भविष्य निर्माता कहे जाने वाले स्कूल कलंकित न हों. 

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