भारत के तमाम हिसों में हुई पत्थरबाजी का अंदाज कश्मीर की पत्थरबाजी से बिल्कुल मिलना खड़े कर रहा कई सवाल व शंका


SC/ST एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किये गये संशोधन के खिलाफ दलित संगठनों ने कल 2 अप्रैल को भारत बंद बुलाया. कहने को तो ये अपने हक के लिए किया जाने वाला आन्दोलन था लेकिन इस भारतबंद में आन्दोलन के अलावा सब कुछ हुआ. देश के ज्यादातर क्षेत्रों में आगजनी, तोड़फोड़, कश्मीरी अंदाज में पत्थरबजी, महिलाओं/युवतियों से छेड़छाड़, बच्चों बुजुर्गों तक की पिटाई, पुलिस थानों में आग तथा पुलिसकर्मियों की पिटाई की गयी. कहा जा रहा था की ये लोग अपने हक के लिए लड़ रहे हैं लेकिन अपने हक़ की ये कैसी लड़ाई दूसरों का हक़ छीना गया, पब्लिक प्रोपर्टी को जोरदार नुक्सान पहुंचाया गया.

आगरा के रावली के उपद्रवियों ने कश्मीर के पत्थरबाजों की याद दिला दी. वहां निशाने पर सेना रहती है, यहां पुलिस थी. वहां मकसद होता है आतंकियों की हिमायत लेकिन यहां तो बगैर किसी वजह केही पुलिस पर हमला किया गया, एक, दो, तीन या चार बार नहीं, सुबह से शाम तक लगातार, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े, रबर की गोलियां चलाई लेकिन पत्थरबाजों पर कोई असर नहीं हुआ व कभी इधर से तो कभी उधर से पत्थर चलते रहे. न स्कूल से आते बच्चों पर तरस आया और न ही परीक्षा देने जाती छात्राओं पर. न स्कूल बस को छोड़ा और न ही एंबुलेस को.  एसएसपी अमित पाठक, एसपी सिटी कुंवर अनुपम सिंह और एएसपी श्लोक कुमार मोर्चे पर डटे थे लेकिन पत्थरबाजों पर कोई असर ही नहीं था. एसपी पूर्वी, एसपी ट्रैफिक भी डटे रहे लेकिन बवाल नहीं थमा.पुलिस लगातार रोकने की कोशिश कर रही थी लेकिन उन्मादियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा था. सबसे आश्चर्यजनक बात ये थी कि पत्थरबाजों में 12 साल के बच्चे, 15-16 के किशोर और 20 से 25 के युवा से लेकर कहीं कहीं बुजुर्ग भी शामिल थे.

पुलिस के पीछे, पुलिस के सामने आकर भी पत्थर चलाए जा रहे थे. शाम को एक गली में पत्थरबाजों के पत्थर खत्म हो तो  बोतल बम से हमला किया गया. किसी ने बोतल में पेट्रोल डालकर बम बनाया तो कोई जूते बनाने में काम आने वाला केमिकल बोतल में भर लाया और पुलिस पर फेंक दिया. हद तो तब हो गयी जब पत्थरबाजों की भीड़ ने ऑटो से एक छात्रा को बाहर खींच लिया, लेकिन उस छात्रा की किस्मत ठीक थी जो अचानक पुलिस की गाडी आ गयी तथा छात्रा को बचाया. उन्मादियों से लड़ने में रावली में पुलिस ने बड़ी हिम्मत दिखाई. एसएसपी और एसपी सिटी भागते भागते पसीनों से तर-बतर हो गए लेकिन रुके नहीं. 20 पुलिसकर्मी ऐसे रहे जो पथराव में घायल हुए. किसी के कंधे में चोट आई तो किसी के पैर से खून निकल रहा था लेकिन इन्होंने हिम्मत नहीं हारी, पत्थरबाजों का मुकाबला करते रहे. अपनी जान पर खेलकर पुलिस ने शहर को बचाया वरना स्थिति खराब हो सकती थी.

अब यहाँ पर सवाल पैदा हुता है कि बसों में-करों में आग लगाना, पुलिस थानों में आग लगाना, पुलिस वालों पर हमला करना, छोटे बच्चों-महिलाओं के साथ मारपीट करना तथा उनको घायल कर देना, दुकानों में मकानों में घुसकर तोड़फोड़ करना लूटपाट करना, स्कूल जाती छात्रों के साथ छेड़खानी करना, कश्मीरियों की तरह पत्थर बरसाना अगर अन्दोलना कहा जा रहा है तो फिर गुंडागर्दी की परिभाषा क्या होती है? सबसे बड़ी बात कश्मीरी अंदाज में पत्थरबाजी तो कई सवाल व शंकाएं पैदा करती है कि क्या पत्थरबाजी की ट्रेनिंग डी गयी थी या इस आन्दोलन में दलितों के साथ कुछ आक्रान्ता भी शामिल थे जिनके बहकावे में आकर ये सब हुडदंग मचाई गयी तथा अपने ही देश को जलाया गया.


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