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उस परिवार को नमन है जो देववाणी संस्कृत को जिन्दा रखने के लिए इस स्तर तक के प्रयास कर रहे….

आज जहाँ हिन्दुस्तान में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है. हमारे देश के युवा भारतीय संस्कृति(देव संस्कृति) से लगातार दूर होते जा रहे हैं. ये बातें उनके रहन सहन, पहनावे व बोल्चाल्में साफ़ झलकती हैं. लोगों को अपनी मातृभाषा हिन्दी बोलने में भी शर्म महसूस होती है लेकिन हमारे ही देश में एक ऐसा परिवार भी मौजूद है जिनकी कहानी जानकार, भारतीय सभ्यता के प्रति उनकी अथाह श्रद्धा को जानकार उन्हें प्रणाम किये बिन नहीं रह सकते.

पश्चिम बंगाल में एक ऐसा परिवार मौजूद है जो देववाणी संस्कृति को ज़िंदा रखने के लिए हमेशा संस्कृति भाषा का ही प्रयोग करते हैं. संस्कृत में बात संस्कृत में झगड़ा ये कहानी है एक बंगाली दंपत्ति की. ये पति पत्नी बात भी संस्कृत में करते हैं और झगड़ा भी संस्कृति में करते हैं. ये एक ऐसे दम्पति हैं जो पाश्चात्य सभ्यता के बढ़ते प्रभाव के बीच दुसरी भाषाओँ के बढ़ते प्रभुत्व के बीच देववाणी संस्कृति को जीवित रखने के लिए प्रयासरत हैं तथा संस्कृति का ही प्रयोग करते हैं.

पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले के कलीनगर हाईस्कूल में संस्कृत भाषा सिखाने वाली 32 वर्षीय मौमिता बार बताती हैं कि उन्होंने अपने पति प्रणब बार के साथ कभी बंगाली भाषा में बात नहीं की. प्रथम बातचीत से लेकर आज तक संस्कृत में ही बात की है. प्रणब बार तथा मौमिता बार का कहना है कि हम चाहे कितनी भे उन्नति क्यूँ न कर लें लेकिन हमें अपनी सभ्यता अपनी संस्क्रती कभी न्हीजं त्यागनी चाहिए.

मौमिता बाबर ने बताया कि वे अपने पति प्रणब बार से साल 2006 में हलिशाहर निगमनंद सरस्वत मठ में मिली थीं. वे वहां संस्कृत भाषा सीख रही थीं और अतिरिक्त पाठ के लिए वहां आईं थीं. वहीं, प्रणब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक सहयोगी संस्था संस्कृत भारती के तहत चलाए गए 15 दिवसीय संस्कृत कैंप में इस भाषा को सिखाने के लिए गए थे. वहां प्रणब से पहली बात ही संस्कृति में हुई थी तब से लेकर आज तक हमने संस्कृति में ही बात की है. मौमिता बार के अनुसार 2010 में हम दोनों ने शादी कर ली लेकिन जब हम पहली बार मिले थे तभी फैसला कर लिया था कि हमेशा संस्कृति में ही बात करेंगे और हम ये कर रहे हैं. निसंदेह प्रणब बार तथा मौमिता बार का ये प्रयास वन्दनीय है.

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