बहुत जल्द थम गया सहारनपुर में हुई मौतों का राजनैतिक शोर.. शोर सिर्फ बंटने शराब का था, जबकि वो था जहर

कुछ निचले स्तर के पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही हुई और कुछ आबकारी के अधिकारियों को निशाना बना दिया गया और थम गया शोर.. झूठी कहानियां गढ़ कर लखनऊ तक पहुँचाई गईं और कभी तेरहवीं आदि में शराब बंटने की बात कह कर जनता को गुमराह किया गया .. फिर समय बिताया गया इस मानसिकता के साथ कि जल्द ही सब भूल जाएंगे और छा जाएगी एक लंबी खामोशी.. और वो सब कुछ सोच सफल होती दिखने भी लगी.. सब कुछ खामोश हो भी रहा है ..

ज्ञात हो कि सहारनपुर में हुईं इतनी मौतों के बाद कहीं से कोई भी एक निकल कर सामने नही आया जो इन सभी मामलों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले.. सब एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप करते रहे और जो सक्षम अधिकारी था उसने अपने नीचे के कर्मचारी पर गाज गिरा कर लखनऊ तक को संतुष्ट कर डाला.. इतना तो तय है कि लखनऊ तक इस बवाल की तपिश नही पहुँची अन्यथा निचले स्तर के अधिकारियो पर कार्यवाही होता देख वो इस मामले में हस्तक्षेप जरूर करता और इतना पूछने का साहस जरूर करता कि क्या ऊपर बैठे सब के सब निर्दोष हैं और उन पर कोई कार्यवाही नही बनती ..

शुरुआती दिनों में उत्तराखंड वाले उत्तर प्रदेश वालों पर व उत्तर प्रदेश वाले उत्तराखंड वालों पर सारा दोष डाल कर खुद के दामन को पाक साफ बताते रहे लेकिन अब सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार ये निकल कर सामने आ रहा है कि जहरीली शराब सहारनपुर में ही बनी थी.. पर सिर्फ जांच की बात कर के उन सभी मृतक परिवारों और न्याय की आशा में बैठे लोगों को संतुष्ट किया गया ..फिलहाल इस मामले में सहारनपुर के अधिकारियों द्वारा सहारनपुर के ही कर्मचारियों पर कार्यवाही करना और लखनऊ का खामोश रहना उंगली उठाता है एक संवेदनहीनता पर जो आने वाले समय मे कोयले की वो राख बन सकता है जो हवा से कभी भी भड़क सकती है ..

Share This Post