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फूलन देवी के घर जब पहुंचा वो इंग्लैंड का प्रोफसर तो फूलन की माँ ने कर दिया उसको बेइज्जत

 फूलन देवी देश की एक ऐसी नारी रही है जिनके बारे में जानने के लिए देश के साथ ही विदेशी नागरिक भी उत्साहित रहते है। जुल्म के खिलाफ फूलन ने सदा अपनी आवाज बुलंद की और सदियों से इस देश में चले आ रहे जातिवाद का खुलकर सामना किया। उनके जीवन से जुड़े तथ्यों पर शोध करने के लिए इंग्लैंड निवासी मुकुल लाल जैसे ही उनके गांव शेखपुर पहुंचे तो उन्हें फूलन की माँ ने पत्थर लेकर दौड़ाया। हलाकि बाद में फूलन की बहन ने उन्हें जानकारी दी। स्व. फूलन देवी भारत की एक ऐसी सख्शियत रही है जिनको पूरा दलित समाज आज भी नमन करता है।

फूलन की जीवन शैली से प्रभावित होकर यूनिवर्सिटी आफ इंस्टागिलियर इंग्लैंड से रिटायर्ड गणित के प्रोफेसर मुकुल लाल, मंगलवार को फूलन के गांव शेखपुर गुढ़ा स्थित घर पर पहुंचे। प्रोफेसर फूलन की जिंदगी से इतने प्रभावित थे की उन्होंने फूलन की माँ से उनके बारे में जानकारी लेने में कामयाब रहे। हालांकि पहले उन्हें फूलन की मां से दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। फूलन की मां मुला देवी ने अपशब्द कह मुकुल को पत्थर लेकर दौड़ाया।

प्रोफेसर फिर भी नहीं माने। उसके बाद फूलन की बहन रामकली से मुलाकात कर फूलन देवी के दस्यु से लेकर सांसद तक के सफर को जाना और आर्थिक सहायता भी प्रदान की। इंग्लैंड निवासी मुकुल लाल गांव में पुलिस सुरक्षा में पहुंचे थे। प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने फूलन देवी पर लिखी गई किताबों तथा समाचार पत्रों के माध्यम से पूर्व दस्यु सुंदरी के बारे में जानकारियां एकत्रित की हैं और इसको लेकर वह एक शोध कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से वह फूलन देवी के गांव आए हैं।

फूलन देवी (10 अगस्त 1963 – 25 जुलाई 2001) डकैत से सांसद बनी एक भारत की एक राजनेता थीं। एक निम्न जाति में उनका जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव गोरहा का पूर्वा में एक मल्लाह के घर हुअा था।फूलन की शादी ग्यारह साल की उम्र में हुई थी लेकिन उनके पति और पति के परिवार ने उन्हें छोड़ दिया था। बहुत तरह की प्रताड़ना और कष्ट झेलने के बाद फूलन देवी का झुकाव मजबूरन डकैतों की तरफ हुआ था। धीरे धीरे फूलनदेवी ने अपने खुद का एक गिरोह खड़ा कर लिया और उसकी नेता बनीं।

गिरोह बनाने से पहले गांव के कुछ लोगों ने कथित तौर पर फूलन के साथ दुराचार किया। फूलन इसी का बदला लेने इसी का बदला लेने की मंशा से फूलन ने बीहड का रास्‍ता अपनाया। डकैत गिरोह में उसकी सर्वाधिक नजदीकी विक्रम मल्‍लाह से रही। माना जाता है कि पुलिस मुठभेड में विक्रम की मौत के बाद फूलन टूट गई। आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में (रॉबिनहुड) की तरह गरीबों का पैरोकार समझा जाता था।

सबसे पहली बार (1981) में वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में तब आई जब उन्होने ऊँची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ तथाकथित (नरसंहार) किया जो (ठाकुर) जाति के (ज़मींदार) लोग थे। लेकिन बाद में उन्होने इस नरसंहार से इन्कार किया था।

इंदिरा गाँधी की सरकार ने (1983) में उनसे समझौता किया की उसे (मृत्यु दंड) नहीं दिया जायेगा और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा और फूलनदेवी ने इस शर्त के तहत अपने दस हजार समर्थकों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। फूलन ने अपनी रिहाई के बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। 1996 में फूलन ने उत्तर प्रदेश के भदोही सीट से (लोकसभा) का चुनाव जीता और वह संसद पहुंची। 

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