लखनऊ के अब्दुल की चोट मेडिकल के बजाय परिजनों के बयानों में ही क्यों ? निशाने पर इंस्पेक्टर या SSP ? वर्दी के मनोबल पर और कितने वार ?

वर्तमान समय में लखनऊ एक बार फिर चर्चा में है. इस बार चर्चा हो रही है एक ऐसे व्यक्ति की मौत पर जिसके ऊपर वाहन चोरी का आरोप था..इतना ही नही वाहन बरामद भी था.. पुलिस कस्टडी से न्यायिक अभिरक्षा में जाने के बाद उसकी लगभग 1 सप्ताह बाद मौत होती है..फिर अचानक ही हल्ला मच जाता है और इसमें दोषी बनाने का प्रयास उस पुलिस अधिकारी को होने लगता है जिसके चलते लखनऊ का चौक इलाका वर्तमान समय मे चैन की नींद सोता है..इतना ही नही, कुछ ने तो अपने शब्द उस अधिकारी तक पहुचा दिए जो अपनी लखनऊ में नियुक्ति के बाद से ही एक खास वर्ग द्वारा निशाने है.. फिलहाल यहां बात हो रही है लखनऊ चौक थाना प्रभारी इंस्पेक्टर उमेश श्रीवास्तव व लखनऊ पुलिस कप्तान कलानिधि नैथानी की..

पहले बात कर ली जाय लखनऊ पुलिस के कप्तान कलानिधि नैथानी की ..उनका कैरियर निष्कलंक रहा है, उन्होंने हमेशा से प्रयास किया कि वो जहां भी रहें वहां सबसे ऊपर कानून का राज हो. उसके नीचे सभी हों, चाहे नेता, अभिनेता, ब्यूरोक्रेट या कोई भी अन्य.. भला कानून को तोड़ने वालों को ये बात रास कैसे आ सकती थी.. शुरू में सोचा कि नया है, इसको मैनेज कर लेंगे .. लेकिन जब सभी प्रयास नाकाम रहे तो आखिरकार शुरू कर दिया पलटवार और ले लिया निशाने पर उस अधिकारी को जिसका पुलिस कैरियर ही नही बल्कि व्यक्तिगत जीवन भी बेदाग रहा है  ..हल्ला बोल अपराधियो पर समाज के हर वर्ग का होना चाहिए जबकि हल्ला बोल पुलिस पर करने की परंपरा न जाने किस ने चलाई ये विचार का विषय है साथ ही बदलाव का भी ..अगर सिर्फ बढ़ते अपराध, कानून व्यवस्था के आंकड़ो पर ही लखनऊ के SSP को घेरा जा रहा होता तो यकीनन ये बात कहीं न कहीं सैद्धांतिक व तार्किक लग रही होती, लेकिन जब विरोध के स्वरों में “योगी के खास” या “शासन के कृपापात्र” जैसे शब्द जोड़े जाने लगे तो खुद से ही समझने के लिए काफी है कि वो सभी शब्द राजनीति से प्रेरित हैं जो ब्यूरोक्रेसी के दबाव को बर्दाश्त नही कर पा रहे हैं ..

अब बात इंस्पेक्टर उमेश श्रीवास्तव की..पुराना लखनऊ कहे जाने वाले अतिमहत्वपूर्ण चौक थाने के प्रभारी हैं ये..कभी शिया सुन्नी तनाव तो कभी साम्प्रदायिक उन्माद के लिए ये स्थान पिछले कुछ वर्ष पहले जाना जाता था. बड़े बड़े कथित तेजतर्रार अधिकारी व सरकारें आई और चली गयी थी लेकिन मुहर्रम में वहां फैलते साम्प्रदायिक उन्माद को रोकने में नाकाम रहीं थी..पर इंस्पेक्टर उमेश की तैनाती के बाद इस इलाके में ऐसी कोई बड़ी वारदात नही हुई जो राजधानी पुलिस की प्रतिष्ठा के लिए सवाल बने.. इसका श्रेय शत प्रतिशत इंस्पेक्टर उमेश को जाता है जिन्होंने दिन और रात एक कर के इन तमाम दिक्कतों पर काबू पाया..इसी के साथ एक दिक्कत और थी और वो थी लखनऊ में वाहन चोरी की..वाहनों की चोरी से वो लोग भी कभी न कभी पीड़ित हुए हैं जो आज लखनऊ पुलिस को बिना ठोस प्रमाणों के निशाने पर ले रहे हैं ..इसको खत्म करने के लिए पुलिस की चौकन्नी नजर ऐसे तमाम संदिग्ध लोगों व वाहनों पर थी..  इतना ही नही प्रदेश की राजधानी होने के चलते लखनऊ में संदिग्ध वाहन आदि बड़े जान माल के लिए खतरे की बड़ी वजह बन सकते थे..इसी के चलते चौक थाने की पुलिस अपनी सतर्कता  उच्चतम स्तर पर रखे हुए थी और उसी के चलते उनके हाथ लग गया था अब्दुल रहीम..

ध्यान देने योग्य है कि लखनऊ की चौक पुलिस ने गत 15 जनवरी को बालागंज निवासी अब्दुल रहीम 28 वर्ष को वाहन चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था.. बताया ये भी जा रहा है कि वो पहले से ही दौरे आने का मरीज था जिसको पुलिस वालों ने उसकी हालत से ही भाँप लिया और सामान्य पूछताछ के बाद पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए उसको जेल भेज दिया ..सुदर्शन न्यूज के पास ऐसी तमाम तस्वीरें हैं जो पुलिस अभिरक्षा में खड़े अब्दुल रहीम की उस हालात की गवाही हैं जो उसके शारीरिक रूप से चोट न खाने के दृश्य को दर्शाता है ..उन तमाम तस्वीरों में रहीम बाकयदा बाइक पर बैठ कर फोटो आदि खिंचवा रहा है और उसके चेहरे पर जरा सा भी पीड़ा , प्रयाश्चित या शिकन के कोई भी भाव नही दिख रहे हैं ..

यहां तक सब सही चला और उस समय अब्दुल रहीम के परिवार वालों ने भी चुप्पी साधे रखी..अब्दुल रहीम के परिजन उस से थाने और जेल में भी मिले बताए जा रहे हैं पर तब उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई बयानबाजी नही की.. पर अचानक ही उनके घर वालों की भाव भंगिमा दोनों बदल गई ..21 तारीख अर्थात लगभग 1 हफ्ते बाद अब्दुल रहीम की मौत जेल अभिरक्षा में हो गयी..जेल से उसको ट्रामा सेंटर भेजा गया था जहां उसको बचाया नही जा सका..इसके बाद अचानक शुरू हुआ आरोप प्रत्यारोप का दौर.. उसके चचेरे भाई चांद का आरोप है कि चौक पुलिस ने वाहन चोरी कबूल कराने के लिए अब्दुल को थाने में थर्ड डिग्री दी थी। उनके अनुसार अगले ही दिन परिवारीजन अब्दुल से जेल में मिलने गए थे उन्हें अब्दुल ने बताया था कि उसे पुलिस ने पीटा है पर तब तक अब्दुल का परिवार खामोश रहा ..

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार दबाव अब्दुल के घरवालों पर ही नही बल्कि पुलिस पर भी था. असल मे अब्दुल से हुई पूछताछ के बाद उसने अपने ही भांजे गप्पू का नाम कबूला था जिसकी तलाश के लिए पुलिस लगातार दबिश दे रही थी..मृतक अब्दुल के रिश्तेदार गप्पू का नाम हटवाने के लिए वो सभी जोर लगाए जा रहे थे, साम  , दाम , दण्ड ,भेद हर प्रयास किये गए पर इंस्पेक्टर उमेश पर वो सभी दबाव निष्प्रभावी रहे और पुलिस व सब करती रही जो कानूनी रूप से सही था..आखिरकार अब मृतक के परिजन जेल अभिरक्षा में हुई मौत को पीस पुलिस से जोड़ दिए हैं जो उनके ही घर के एक अन्य वांछित गप्पू की तलाश में लगातार छापेमारी करते हुए लखनऊ से वाहन चोरों के एक बड़े नेटवर्क को खत्म करने और समाज को शांति व सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध थी ..

अब तक इस मामले में पिटाई से हुई मौत में पिटाई और चोट शब्द केवल मीडिया के कुछ खास वर्ग के शब्दों में और मृतक के परिजनों के आरोपों में ही दिखाई दे रहे हैं .. अभी तक किसी मेडिकल रिपोर्ट या प्रमाणिक जांच आदि में ये आरोप सिद्ध नहीं हो पाए हैं..मात्र जुबानी आरोपो पर इतना शोर कहीं न कहीं शोर मचाने वालों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है..जब बात अफ़ज़ल जैसे आतंकी की हो तब उसके लिए सुप्रीम कोर्ट और बाद में राष्ट्रपति तक के फैसले का की प्रतीक्षा करने वालों द्वारा पुलिस वालों को मौखिक आरोप लगाते ही दोषी मान लेना कहीं न कहीं समाज की शांति और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार इस बल के साथ अन्याय ही कहा जायेगा .. अब्दुल के घर वाले ये साफ साफ नही बता रहे हैं कि अब्दुल दौरे या मिर्गी जैसी बीमारी से पीड़ित रहा है या नही , ..इन तमाम आपाधापी मे उस गप्पू का नाम छिप सा रहा है जो वाहन चोरी के इसी मामले में वांछित है.. यहां तक कि राममनोहर लोहिया जैसे प्रतिष्ठित अस्पताल में भी डॉक्टरों के बयान में कहीं भी पुलिस द्वारा मार पिटाई आदि की बात नही कही गयी..

सवाल ये है कि मात्र जुबानी आरोपो से पुलिस बल को कटघरे में खड़ा कर के उनके मनोबल पर वार करना कितना सही माना जा सकता है .खुद चौक थाने की व लखनऊ के तमाम पुलिस वालों को अब्दुल रहीम की मौत का दुख है और उसके परिवार के साथ पूरी संवेदना भी लेकिन पुलिस के लिए आरोप लगाने वालों को भी कहीं न कहीं संवेदना रखनी चाहिए..रहीम की निशानदेही पर चोरी के छह अन्य वाहन बरामद किये गए थे जिस पर किसी ने  भी इस अंंदाज में उनकी प्रशंसा नही की थी पर मात्र 1  मौखिक आरोप के बाद पुलिस के खिलाफ हल्ला बोल देना कही न कही वर्दी वालों के साथ अन्याय ही कहा  जाएगा ..

यहां इस खबर का कानूनी पक्ष ये है कि पुलिस अभिरक्षा से न्यायिक अभिरक्षा में जाते समय अब्दुल का बाकयदा मेडिकल करवाया गया था जिसमें मेडिकल रिपोर्ट में किसी चोट तो दूर, किसी दर्द का भी कोई प्रमाण नही मिला था.. इसके साथ ही जेल प्रशासन उन्ही बंदियों को स्वीकार करता है जो शारीरिक रूप से फिट होते हैं , यदि जेल प्रशासन को किसी भी प्रकार की शारीरिक अस्वस्थता किसी बंदी में दिखाई देती है तो उसका दुबारा मेडिकल करवाया जाता है पर अब्दुल रहीम के साथ ऐसा कुछ भी मेडिकल रूप से नही था जिसका शोर मचाया जा रहा है .. जेल प्रशासन द्वारा भेजे गए एक आधिकारिक पत्र में भी इस बात का साफ जिक्र है कि अब्दुल रहीम दौरों से पीड़ित था..और अंत मे ये मृत्यु न्यायिक अभिरक्षा में हुई है जिसमें पुलिस अभिरक्षा का शोर कैसे मच रहा है ये सबसे हैरान कर देने वाला पहलू है जिस पर शासन ही नही बल्कि प्रशासन को भी ध्यान देने की जरूरत है .. क्या इसके बाद ये परंपरा नही हो जाएगी कि कई वर्ष बाद भी बीमार ही पड़ा कोई मुलजिम बाद में पुलिस को दोष देगा कि काफी समय पहले पुलिस अभिरक्षा में जाने के चलते इतने समय बाद ये बीमारी मुझे उसी के चलते हो गयी ..

हर कोई साधारण व्यक्ति या कोई दोषी जीवन काल मे पुलिस थाने या चौकी तक विभिन्न कार्यो से जाता रहता है..क्या उसके बाद उसके जीवन मे होने वाली हर घटना का जिम्मेदार पुलिस को बनाने की परंपरा चल निकलेगी ? ऐसे में क्या समाज मे न्याय बचेगा या कोई पुलिस वाला हिम्मत कर पायेगा किसी दोषी के दोष पर प्रभावी ढंग से रोक लगाने में ? क्या कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना की ये परंपरा आने वाले समय मे लखनऊ के जनसाधारण के लिए सुरक्षा आदि की चिंता का कारण नही बनेगी ?

आतंक और अपराध से लडती पुलिस जब आखिर फर्जी और आधारहीन आरोपों का भी सामना करना पड़ता है तो ये यकीनन पुलिस से ज्यादा उस समाज के लिए घातक होता है जिसकी रक्षा वो पुलिस वाला कर रहा होता है . शारीरिक रूप से घायल जवान कई बार अपने मोर्चे पर डटा रहता है लेकिन मानसिक रूप से चोटिल रक्षको के लिए मोर्चे पर डटे रहना किसी भी रूप से सम्भव नहीं हो पाता . .ज्ञात हो कि शासन के निर्देश पर जब कानून व्यवस्था के पेंच कसे गये तब से ऐसे कई मामले सामने आये हैं जब पुलिस वालों को फर्जी और आधारहीन आरोपों का शिकार बनाया गया है .

फर्जी आरोपों की लाइन लगाए ये वो लोग हैं जो कभी कानून को ठीक से पालन करने में अपनी तौहीनी समझते थे लेकिन जब से प्रशासन ने उनको सही राह दिखाने की कोशिश की तो वो अपने असल रूप में आ गये और निशाने पर ले लिया प्रशासन को ही .उत्तर प्रदेश के योगीराज में जहाँ पुलिस बेहद चुस्त और दुरुस्त हो कर प्रशासनिक और कानूनी शासन को मजबूती के साथ पटरी पर लाना चाहती है वहीँ उसकी राह में तरह तरफ से रोड़े बिछाये जा रहे हैं . कहीं उसे पत्थरों का सामना करना पड़ रहा , कहीं उसे गोलियां झेलनी पड़ रही .. और अब इन सब बातों से पार पा जाए तो अंतिम हथियार के रूप में आधारहीन और नकली स्वरचित आरोप झेलने पर मजबूर किया जा रहा .

आये दिन ऐसे तमाम मामले सामने आ रहे हैं जिसमे शासन और प्रशासन के अधिकारियो को ऐसे कई झूठे और स्वरचित मामलो से न सिर्फ मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया है बल्कि उनके सामाजिक जीवन को भी प्रभावित किया गया है .. बिजनौर के सिपाही कमल शुक्ला , रामपुर के सब इंस्पेक्टर जय प्रकाश , मुरादाबाद चंदौसी के चौकी इंचार्ज हरपाल सिंह , शाहजहांपुर के सिपाही, देवरिया में थानाध्यक्ष श्रवण यादव के बाद अब चौक लखनऊ के थानेदार उमेश श्रीवास्तव पर इस प्रकार बिना पूरी जाांच के आरोप लगाने वालों पर कड़ी कार्यवाही न हुई तो निश्चित तौर पर ये समाज की शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाले, आतंक और अपराध से लड़ते पुलिस बल के लिए किसी भी रूप में सार्थक परिणाम नहीं देगा और इसका असर जनता पर जरूर पड़ेगा. फिलहाल अंतिम निर्णय शासन व उच्चअधिकरियो के हाथ में है .

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