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अगर छत्तीसगढ़ में जीती कांग्रेस तो कौन होगा राज्य का अगला मुख्यमंत्री ?? इन तीन चेहरों का नाम सबसे आगे

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को विशाल बहुमत मिलता हुआ दिखाई दे रहा है. ताजा रुझानों में कांग्रेस पार्टी ६४ सीटों पर आगे चल रही है तो वहीं 15 साल से सत्ता चला रही भारतीय जनता पार्टी मात्र 18 सीटों पर आगे चल रही है. इन रुझानों के साथ ही यह स्‍पष्‍ट होता दिख रहा है कि कांग्रेस अगली सरकार बनाने जा रही है तथा बीजेपी 15 सालों में पहली बार सत्‍ता से बाहर होती दिख रही है. इन परिणामों के साथ सवाल उठ रहा है कि सत्‍ता में आने की स्थिति में पार्टी की तरफ से कौन मुख्‍यमंत्री बनेगा? इस मामले में अभी तीन चेहरे सीएम रेस में सबसे आगे दिख रहे हैं.

टीएस सिंह देव
छत्तीसगढ़ की राजनीति में टीएस सिंह देव का नाम वरिष्ठ नेताओं में शुमार होता है. टीएस सिंह देव जनता के बीच काफी लोकप्रिय हैं तथा वह बेहद ही कद्दावर नेता माने जाते हैं. 31 अक्टूबर 1951 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में जन्मे टीएस सिंह देव का पूरा नाम त्रिभुवनेश्वर शरण सिंह देव है. टीएस सिंह देव वर्तमान में छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं. टीएस सिंह देव सरगुजा रियासत के पूर्व राजा हैं और लोग उन्हें प्यार से टीएस बाबा के नाम से पुकारते हैं. टीएस बाबा ने इतिहास में एमए किया है. वह भोपाल के हमीदिया कॉलेज के छात्र रहे हैं. टीएस सिंह देव के राजनीतिक जीवन की शुरुआत साल 1983 में अंबिकापुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष चुने जाने के साथ हुई. सार्वजनिक जीवन में उनके सीधे, सरल स्वभाव और उदार व्यवहार के कारण ही वह 10 साल तक इस पद पर बने रहे. साल 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में टीएस सिंह देव ने पहली बार चुनाव लड़ा. वह सरगुजा जिले की अंबिकापुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे और उन्होंने बीजेपी के अनुराग सिंह देव हराया. साल 2013 के चुनाव में भी टीएस सिंह देव अंबिकापुर से ही मैदान में उतरे इस बार भी उनका मुकाबला बीजेपी के अनुराग सिंह देव से ही था जिसमें एक बार फिर टीएस सिंह ने जीत हासिल की. जनवरी 2014 को टीएस सिंह देव छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता विपक्ष चुने गए.

भूपेश बघेल
इस कड़ी में दूसरा नाम कांग्रेस प्रदेश कमेटी के प्रमुख भूपेश बघेल का नाम है. वह पाटन सीट से मैदान में उतरे हैं. राज्‍य में राजनीति के केंद्र बिंदुओं में से एक पाटन विधानसभा क्षेत्र में इस बार उनके सामने भाजपा ने मोती लाल साहू के रूप में एक नए चेहरे को चुनावी अखाड़े में उतारा है. अपने तेवरों से छत्तीसगढ़ की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले राजनेताओं में शुमार बघेल का नाता विवादों से भी कम नहीं रहा है. सीडी कांड की वजह से भूपेश बघेल सुर्खियों में रहे हैं. इसके चलते उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने जमानत लेने से इनकार कर दिया था. 23 अगस्त 1961 को जन्मे बघेल कुर्मी जाति से आते हैं. बात 1980 के दशक की है, जब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. उस वक्‍त भूपेश बघेल ने पॉलिटिक्‍स में अपनी पारी की शुरुआत यूथ कांग्रेस के साथ की. दुर्ग जिले के रहने वाले भूपेश यहां के यूथ कांग्रेस अध्यक्ष बने. वे 1990 से 94 तक जिला युवक कांग्रेस कमेटी, दुर्ग (ग्रामीण) के अध्यक्ष रहे. भूपेश बघेल वह छत्तीसगढ़ मनवा कुर्मी समाज के 1996 से वर्तमान तक संरक्षक बने हुए हैं. मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड के 1993 से 2001 तक निदेशक भी रहे हैं.

2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो वह पाटन सीट से विधानसभा पहुंचे. इस दौरान वह कैबिनेट मंत्री भी बने. 2003 में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने पर भूपेश को विपक्ष का उपनेता बनाया गया. अक्तूबर 2014 में उन्हें छत्तीसगढ़ कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और वे तब से इस पद पर हैं. भूपेश बघेल का विवादों से भी काफी नाता रहा है. साल 2017 के अक्‍टूबर में वायरल हुए एक कथित सेक्स टेप में दिल्ली से एक पत्रकार की गिरफ्तारी हुई थी. इस मामले में भाजपा ने कांग्रेस नेताओं पर कथित सेक्स सीडी बांटने का आरोप लगाया था. इस सीडी कांड में पत्रकार के साथ ही भूपेश बघेल के खिलाफ रायपुर में एफआईआर दर्ज हुई थी. बाद में राज्य सरकार की तरफ से यह मामला सीबीआई को सौंप दिया था और जांच एजेंसी द्वारा बीजेपी और कांग्रेस नेताओं से पूछताछ की गई थी. अक्टूबर में ही भूपेश बघेल नए विवाद में पड़ गए थे. उन्‍होंने एक सभा में बीजेपी पर निशाना साधते हुए लड़कियों के लिए आपत्तिजनक शब्द कह डाले थे, जिससे नाराज होकर वहां मौजूद महिलाएं बीच कार्यक्रम में ही उठकर चली गईं थीं.

चरणदास महंत
पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार किए जाते हैं. वह भी सीएम की रेस में हैं. उनका राजनीतिक करियर 2009 में अपने शिखर पर पहुंचा जब 15वीं लोकसभा के लिए वह छत्तीसगढ़ से अकेले कांग्रेसी सांसद थे. महंत का राजनीतिक जीवन मध्य प्रदेश विधानसभा के साथ शुरू हुआ. वह 1980 से 1990 तक दो कार्यकाल के लिए विधानसभा सदस्य रहे. 1993 से 1998 के बीच वह मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रहे. 1998 में उनके राजनीतिक करियर का एक अहम पड़ाव साबित हुआ. इस साल वह 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए. 1999 में उनकी कामयाबी का सफर जारी रहा और वह 13वीं लोकसभा के लिए भी चुने गए. महंत 2006 से 2008 तक छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. इसके बाद 2009 में वह 15वीं लोकसभा के लिए भी चुने गए. 6 अगस्त, 2009 वह पब्लिक अंडरटेक्गिंस के सदस्य रहे जबकि 31 अगस्त को विज्ञान और प्रौद्योगिकी समिति के भी सदस्य बनाए गए. महंत मनमोहन सिंह सरकार में राज्य मंत्री, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय का पदभार संभाला.  23 सितंबर, 2009 को, वह संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते पर बनी संयुक्त समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए. हालाँकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कोरबा सीट पर उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.

 

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