सुदर्शन के राष्ट्रवादी पत्रकारिता को सहयोग करे

Donation

एक और सटीक वास्तु विश्लेषण राम जन्मभूमि वास्तु के कारण ही विवादित है और रहेगी

सरयू नदी के किनारे बसी (हिन्दुओं के आराध्य) मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्यापुरी का उल्लेख भारत के कई प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है

Kuldeep Saluja
  • Jan 15 2024 4:38PM
सरयू नदी के किनारे बसी (हिन्दुओं के आराध्य) मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्यापुरी का उल्लेख भारत के कई प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है. जहां एक ओर अयोध्या अनादिकाल से प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर राम जन्मस्थली सदियों से विवादित है. इस विवाद से जुड़े मुकदमे पर पिछले दिनों प्रयागराज  हाइकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया. फैसले में आस्था और व्यावहारिकता का अनोखा तालमेल था. 

इस फैसले पर हिन्दुओं और मुसलमानों की प्रतिक्रिया शुरू के एक-दो दिन तक काफी सकारात्मक आई, किन्तु इसके बाद बयान देने वालों का रुख एकदम बदल-सा गया और मीडिया के माध्यम से इस प्रकार के बयान आने शुरू हो गए ( वक्फ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान. निर्मोही अखाड़े ने भी अपना रुख बदला. सुलह की कोशिश को धक्का. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा देंगे हाइकोर्ट के फैसले को चुनौती. मुद्दा कभी खत्म नहीं होगा. सुलह से विवाद सुलझाने की कोशिश को पलीता. अयोध्या विवाद सुप्रीम कोर्ट जाना तय था. समझौते की कोशिश को झटका तोहफे में नहीं दी जा सकती मस्जिद इत्यादि ) इस प्रकार अयोध्या फैसले के बाद जहां मोहब्बतों का सैलाब उमड़ा, वहीं नफरतों की लहर भी चल पड़ी थी.

जानकारी के लिए बता दें कि 1528 में बाबरी मस्जिद बनने के बाद राम जन्मभूमि स्थल को लेकर हिन्दू और मुस्लिम के बीच कई बार हिंसक झड़पें हो चुकी हैं. अंग्रेजी हुकूमत ने भी विवाद सुलझाने के प्रयास किए, परन्तु विवाद ने कभी समाप्त होने का नाम नहीं लिया. वहीं, जुलाई 1990 में विवादित स्थल की ओर बढ़ रहे उग्र कारसेवकों को रोकने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं, कई कारसेवक मारे गए थे. 

6 दिसंबर, 1992 को हिन्दुओं द्वारा बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराये जाने के बाद विवाद इतना गहरा गया कि कई जगह हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़के और 2000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. इसके बाद फरवरी 2002 में रामनवमी के दिन अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों से भरे साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर आग लगा दी गई थी. इसमें 58 कारसेवकों की मौत हो गई थी. इसके बाद पूरे गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिसमें करीब 2000 लोगों की मौत हुई थी.

 2005 में पांच हथियार बंद आतंकवादियों ने विवादित परिसर पर हमला किया. सुरक्षाबलों ने पाँचों को मार गिराया था. राम जन्मभूमि से सम्बन्धित उपरोक्त हिंसक झड़पों के इतिहास को देखते हुए आम जन-मानस के मन में प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि लगभग पिछले 500 सालों से इस स्थान पर अपना अधिकार पाने के लिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्षों के बीच हुई हिंसक झड़पों में हजारों लोग मारे जा चुके हैं और अब सोचने की बात यह है कि प्रयागराज हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के आए फैसले के बाद आखिर इस स्थान का भविष्य क्या है? जब हम अयोध्यापुरी और राम जन्मभूमि दोनों स्थानों की भौगोलिक स्थिति को वास्तु की नजर से देखेंगे, तो इस स्थान का भविष्य आइने की तरह साफ हो जाएगा- आइए! सबसे पहले देखते हैं कि प्राचीनकाल से अयोध्या को इतनी प्रसिद्धि क्यों मिली हुई है?

अयोध्या की उत्तर दिशा से सरयू नदी बहती हुई पूर्व दिशा की ओर घुमाव लेकर पूरे नगर को घेरती हुई पूर्व दिशा की ओर ही आगे को बढ़ गई है. जिस स्थान पर वर्तमान में रामलला की मूर्ति रखी है (जहां कभी बाबरी मस्जिद होती थी), वह स्थान अयोध्या का सबसे ऊंचा स्थान है और वहां जमीन में चारों दिशाओं में ढलान है. यह ढलान उत्तर और पूर्व दिशा की ओर सरयू नदी तक चला गया है. उत्तर एवं पूर्व दिशा में भूमि का ढलान सामान्य है, सामान्यतः ऐसा ढलान
नदी के किनारे बसे सभी नगरों में पाया जाता है. वास्तुशास्त्र के अनुसार, किसी भी स्थान पर जो वास्तुनुकूलताएं होती हैं, उनके शुभ परिणाम वहाँ मिलते हैं और जो वास्तुदोष होते हैं, उनके अशुभ परिणाम प्राप्त होते हैं.

वास्तुशास्त्र के इसी सिद्धान्त के अनुसार जहां उत्तर दिशा में ढलान हो और साथ में अधिक मात्रा में पानी हो तो वह स्थान निश्चित ही प्रसिद्धि प्राप्त करता है और पूर्व दिशा की ओर का ढलान और पानी धनागमन में सहायक होता है. अयोध्या के उत्तर दिशा के ढलान और उसके आगे सरयू नदी के कारण यह नगरी प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है, (जैसे विश्व के सातों आश्चर्य भी अपनी उत्तर दिशा की अनुकूलता के कारण ही प्रसिद्ध हैं. सभी आश्चर्यो की उत्तर दिशा में गहरी निचाई है और ज्यादातर आश्चर्यों की उत्तर दिशा में पानी है, जैसे ताजमहल की उत्तर दिशा में यमुना नदी और पेरिस के एफिल टॉवर की उत्तर दिशा में सीन नदी बह रही है, म्रिस के गीजा पिरामिड़ की उत्तर दिशा में गहरी निचाई के साथ, पूर्व दिशा में नील नदी बह रही है.

भारत के पहले और विश्व के दूसरे नम्बर के धनी प्रसिद्ध धार्मिक स्थल तिरुपति बालाजी की उत्तर दिशा में बड़े आकार का स्वामी पुष्यकरणी कुण्ड के साथ-साथ उत्तर, पूर्व दिशा तथा ईशान कोण में तीखा ढलान है और दक्षिण-पश्चिम दिशा में ऊंचाई है. नाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी का मंदिर भी उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर ढलान एवं उत्तर से पूर्व दिशा की ओर बहने वाली बनास नदी के कारण ही प्रसिद्ध है. जम्मू, कटरा स्थित वैष्णोदेवी मंदिर एवं शिर्डी स्थित साईंबाबा के मंदिर की उत्तर दिशा में भी निचाई है. हरिद्वार स्थित हर की पौढ़ी की प्रसिद्धि का कारण दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर निचाई तथा पश्चिम दिशा के पहाड़ की ऊंचाई और पूर्व दिशा में बह रही गंगा नदी की गहराई है. मदुरै स्थित मीनाक्षी मंदिर को उत्तर दिशा में बहने वाली वैगै नदी के कारण ही प्रसिद्धि मिली है.

इसी प्रकार दक्षिण भारत के सभी प्रसिद्ध मंदिरों जैसे ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम. गरुवयर मंदिर त्रिशर. कण्ठेश्वरा मंदिर नंजनगड मैसर. श्रीरंगनाथ स्वामी श्रीरंगपत्तनम्, पद्मनाभ स्वामी मंदिर तिरुअन्नतपुरम्, सुचीद्रम टेम्पल कन्याकुमारी, वडक्कन्नाथन मंदिर त्रिशुर इत्यादि मंदिरों के उत्तर दिशा में पानी के कुण्ड हैं या नदी बह रही है. जयपुर स्थित आमेर का किला, भग्यनगर स्थित गोलकुण्डा फोर्ट की प्रसिद्धि में भी उत्तर एवं पूर्व दिशा की निचाई और वहां पानी का जमाव ही उन्हें प्रसिद्धि दिलाने में सहायक हो रहा है. इसी प्रकार चंडीगढ़ की प्रसिद्धि ईशान कोण स्थित सुखना लेक और जयपुर की प्रसिद्धि ईशान कोण स्थित जलमहल तालाब के कारण है.) अयोध्या में किसी भी प्रकार का न तो कोई बड़ा उद्योग है, न ही कोई व्यापारिक मंडी है, किन्तु नगर की उत्तर एवं पूर्व दिशा में ढलान और उत्तर से पूर्व दिशा में बहने वाली सरयू नदी के कारण यहाँ धन की कमी नहीं है. 

अयोध्या में 7972 मंदिर हैं। असंख्य संत हैं, 562 रजिस्टर्ड पण्डे-पुजारी, 500 से अधिक गाइड के साथ-साथ यहाँ हनुमान जी की फौज (बंदर) भी बहुत अधिक तादाद में हैं. नगरवासियों के साथ-साथ, संत, पण्डे-पुजारी, गाइड, बंदर इत्यादि सभी का भरण-पोषण आसानी और अच्छे तरीके से हो रहा है. इस नगर में धन की अच्छी आवक है. जैसा कि, गाइड ने बताया. अब वास्तु-विश्लेषण करते हैं राम जन्मभूमि परिसर की भौगोलिक स्थिति का और देखते हैं, यह स्थान प्रसिद्ध होने के साथ-साथ इतना विवादित क्यों है? राम जन्मभूमि परिसर में बाबरी मस्जिद के मलबे से बने टीले के ऊपर अस्थायी शेड के अन्दर वर्तमान में रामलला पूर्वमुखी विराजित हैं. यह स्थान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण पहले से ही सबसे ऊंचा था (जैसा कि, आप चित्र में देख सकते हैं।) बाबरी मस्जिद टूटने के बाद अब यह ऊँचाई मलबे के कारण और भी बढ़ गई है.

अस्थायी शेड के सामने उत्तर एवं पूर्व दिशा में भूमि का ढलान सामान्य है, जबकि इस टीले के ठीक पीछे पश्चिम दिशा एवं नैऋत्य कोण में भूमि का कटाव एकदम खड़ा एवं काफी गहरा है. जब दर्शनार्थी रामलला के दर्शन करते हैं, तो शेड के पीछे पश्चिम दिशा में ऐसा प्रतीत होता है जैसे वहाँ खाई हो. साथ ही शेड के पीछे पश्चिम दिशा में दुराही कुआँ भी है. वास्तुशास्त्र के अनुसार, जहाँ पश्चिम दिशा में ढलान, गड्ढे, कुआँ, तालाब या किसी पश्चिम नैऋत्य से लिया गया बाबरी मस्जिद का फोटो भी रूप में निचाई हो तो ऐसे स्थान पर रहने वालों में दूसरों की तुलना में ज्यादा धार्मिकता रहती है. जिन घरों में पश्चिम दिशा में निचाई एवं पानी होता है, उन घरों में रहने वाले जरूरत से ज्यादा धार्मिक होते हैं. नैऋत्य कोण का इतना तीखा ढलान अमंगलकारी होकर वास्तुशास्त्र के अनुसार, जहाँ पश्चिम दिशा में ढलान, गड्ढे, कुआँ, तालाब या किसी भी रूप में निचाई हो तो ऐसे स्थान पर रहने वालों में दूसरों की तुलना में ज्यादा धार्मिकता रहती है.

 जिन घरों में पश्चिम दिशा में निचाई एवं पानी होता है, उन घरों में रहने वाले जरूरत से ज्यादा धार्मिक होते हैं. नैऋत्य कोण का इतना तीखा ढलान अमंगलकारी होकर विनाश का कारण बनता है. दुनिया में जिन घरों में भी हत्याएँ जैसी अनहोनी घटनाएँ घटती हैं, उन घरों के नैऋत्य कोण में इस प्रकार के दोष अवश्य होते हैं. राम जन्मभूमि परिसर में आने के दो मार्ग पूर्व दिशा से हैं. एक मार्ग जहाँ दर्शनार्थी रामलला के दर्शन के लिए रंगमहल बेरियर से होते हुए उत्तर ईशान से परिसर के अन्दर घुसते हैं और फिर परिसर की पूर्व दिशा में चलते हुए परिसर के पूर्व आग्नेय से ही अन्दर की ओर मुड़ते हैं, जहाँ आज-कल कतार में लगकर दर्शन करने के लिए बेरिकेट्स लगे हैं. दूसरा मार्ग अयोध्या नगरी के मुख्य मार्ग से परिसर में अन्दर आने का पुराना मार्ग है. जो इस परिसर के पूर्व आग्नेय भाग से टकराता है। आजकल इस मार्ग का उपयोग वी.आई.पी एवं पुलिस के वाहनों के आने-जाने के लिए किया जा रहा है.

 दर्शनार्थियों के बाहर जाने का रास्ता भी परिसर के पूर्व आग्नेय से ही है. तात्पर्य परिसर में आने-जाने के सभी रास्ते पूर्व आग्नेय से ही है. परिसर में पूर्व आग्नेय में प्रवेशद्वार होने के साथ-साथ परिसर को पुराने मार्ग से पूर्व आग्नेय का मार्ग प्रहार भी हो रहा है और इसी मार्ग के कारण जन्मभूमि परिसर की तार फेंसिंग से परिसर का पूर्व आग्नेय वाला भाग बढ़ भी गया है. वास्तुशास्त्र के अनुसार तार फेंसिंग भी चारदीवारी की तरह ही प्रभाव देती है. वास्तुशास्त्र के अनुसार पूर्व आग्नेय के दोष ही विवाद और कलह के कारण बनते हैं। दुनिया में जहाँ भी विवाद होते हैं, चाहे छोटे हो या बड़े, वहाँ पूर्व आग्नेय में दोष अवश्य पाया जाता है. राम जन्मभूमि परिसर के पूर्व आग्नेय में उपरोक्त तीन दोष एक साथ होने के कारण ही विवाद इतना अधिक बढ़ गया है.

राजस्थान के चित्तौड़ शहर के पहाड़ पर स्थित दुर्ग में इसी पूर्व आग्नेय के द्वार के कारण ही हमेशा युद्ध होते रहे। दुर्ग के 13 किलोमीटर के परिसर में पश्चिम दिशा के ढलान के कारण ही इस पहाड़ी पर 113 मंदिर हैं, जिनमें से 50 आज भी अच्छी हालत में है. दुर्ग के नैऋत्य कोण के ढलान के कारण हजारों की तादाद में सैनिक मारे जाते रहे और रानी पद्मिनी सहित कई स्त्रियों को आत्मदाह करना पड़ा. इन्हीं तीन दोषों के कारण यहाँ हमेशा युद्ध होते रहे और थोड़े-थोड़े अंतराल में शासक बदलते रहे और यही तीनों दोष राम जन्मभूमि परिसर में भी हैं.

आपके मन में यह विचार आ सकता है कि अब चित्तौड़ के दुर्ग में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति क्यों निर्मित नहीं हो रही है? इसका कारण है कि जब तक दुर्ग की चारदीवारी बनी हुई थी, तब तक पूरी पहाड़ी का वास्तु एक था और उसका प्रभाव चारदीवारी के अन्दर रहने वालों पर पड़ रहा था, परन्तु आज चारदीवारी कई जगह से टूट गई है और कई पोल के दरवाजे निकल गए हैं. ऐसी स्थिति में अब जो लोग पहाड़ी पर स्थित बस्ती में रह रहे हैं, उनके घरों के वास्तु प्रभाव उनके घर की बनावट के अनुसार उन परिवारों पर पड़ रहा है. 

इस वास्तु-विश्लेषण से स्पष्ट है कि राम जन्मभूमि परिसर की पश्चिम दिशा के वास्तुदोषों के कारण इस स्थान के प्रति लोगों में जुनून की हद तक धार्मिकता है. पूर्व आग्नेय के दोष के कारण, स्थान को लेकर हो रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है और नैऋत्य कोण के दोष के कारण समय-समय पर हत्याएँ और अनहोनी हो रही है.

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में विवादित स्थल पर ढाई हजार साल पहले कोई न कोई मंदिर का ढाँचा मौजूद रहने के संकेत दिए गए हैं, जिसकी नींव पर बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ और फिर बाबरी मस्जिद के मलबे पर रामलला की मूर्ति रखकर अस्थायी शेड बनाया गया है, अर्थात् समय-समय पर यहाँ बना भवन टूटता रहा है. चीनी वास्तुशास्त्र फेंगशुई का एक सिद्धान्त है कि यदि पहाड़ के मध्य में कोई भवन बना हो, जिसके पीछे पहाड़ की ऊँचाई हो, आगे की तरफ पहाड़ की ढलान हो और ढलान के बाद पानी का झरना, कुण्ड, तालाब, नदी इत्यादि हो, ऐसा भवन प्रसिद्धि पाता है और सदियों तक बना रहता है.
 
नाथद्वारा में भी दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में बहुत ऊँचाई है और उत्तर पूर्व दिशा की ओर तीखा ढलान है. ढलान के मध्य में श्रीनाथ मंदिर परिसर है. परिसर के बाद सिंहाड तालाब है और तालाब के बाद बनास नदी बह रही है. तिरुपति बालाजी में भी मंदिर के ठीक पीछे पश्चिम दिशा में पहाड़ है और दक्षिण दिशा में काफी ऊँचाई है और आगे उत्तर एवं पूर्व दिशा में पुष्यकरणी कुंड के साथ-साथ तीखा ढलान दूर तक चला गया है. जबकि रामजन्म भूमि परिसर की भौगोलिक स्थिति फेंगशुई के इस सिद्धान्त के बिलकुल विपरीत है, क्योंकि इसके पीछे दक्षिण एवं पश्चिम दिशा में गहरी खाई के समान निचाई है. इस वास्तुदोष के कारण इस स्थान पर बने भवन बार-बार ध्वस्त होते रहे.

राम जन्मभूमि पर हाईकोर्ट की तरह, सुप्रीम कोर्ट भी दिलों को जोड़ने वाला सम्मानजनक समाधान निकाल दे, तब भी जन्मभूमि परिसर के उपरोक्त वास्तुदोषों के कारण यह विवाद कभी सुलझ नहीं सकता. देश के अमन-चैन चाहने वाले भी विवाद को सुलझाने के लिए चाहे कितने ही सकारात्मक प्रयास क्यों न कर लें. नतीजा कुछ भी नहीं निकलने वाला, यह बिलकुल तय है.

वास्तु परामर्श - यदि इस विवाद को पूर्ण रूप से समाप्त करना है, तो सरकार को चाहिए कि वह राम जन्मभूमि परिसर के वास्तुदोषों को पहले दूर करें, जैसे- राम जन्मभूमि परिसर की पश्चिम दिशा एवं नैऋत्य कोण की निचाई को मिट्टी डालकर टीले के बराबर किया जाए और परिसर की इन दिशाओं में 8 से 10 फीट ऊँची कम्पाउण्ड वॉल बनाई जाए. इसी के साथ पूर्व आग्नेय के मार्ग को समाप्त किया जाए एवं इस दिशा के सभी द्वार बंद कर इन्हें पूर्व ईशान की ओर स्थानान्तरित किया जाए तो निश्चित रूप से इस स्थान को लेकर जो विवाद सदियों से चल रहा है, वह पूर्णतः समाप्त हो जाएगा और देश में अमन-चैन आ सकेगा.

0 Comments

संबंधि‍त ख़बरें

अभी अभी