18 सितम्बर: बलिदान दिवस पिता-पुत्र राजा शंकरशाह और रघुनाथ शाह जो तोप से उड़ा देने तक प्रजा को देते रहे युद्ध का संदेश

कितना सच है दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल .. इस गाने में कितनी सच्चाई है ये ऐसे

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3 सितम्बर- आहुति दिवस बाल वीरांगना कुमारी मैना. 1857 महायुद्ध में सबसे कम आयु की आहुति, मात्र 13 वर्ष… विचार कीजिए कि हमें आजादी कैसे मिली ?

इन वीरांगनाओं की आहुति को जान कर वो कौन होगा जो बिना खड्ग बिना ढाल वाले गाने को गायेगा .

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19 जुलाई: जन्मजयंती महावीर मंगल पाण्डेय.. आज भी जिसके नाम से होता, रोम रोम में कम्पन है.. भारत के उस बाहुबली की हिम्मत का अभिनंदन है

आज का पवन दिन उस गाने को गाली के समान साबित करता है जिसे अमूमन हर व्यक्ति को रटाया गया

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22 जून: बलिदान दिवस सेठ अमरचन्द बांठिया.. जिंदगी भर कमाई पूरी पूँजी दे दी क्रांतिकारियों को जिसे अंग्रेजो ने माना अपराध और दे दी फांसी

इन्हें कहीं किसी किताब आदि में आप नहीं पायेंगे .. ये जीवंत भामाशाह हैं १८५७ की क्रांति के जिन्होंने अपना

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13 जून: बलिदान दिवस “राजा बलभद्र सिंह” .. भाई का विवाह और गर्भवती पत्नी दोनों को छोड़ कर कूद गए 1857 के संग्राम में और कई अंग्रेजो का वध करते हुए आज ही हुए थे बलिदान

ये वो योद्धा था जिनका जिक्र शायद किताबों में न मिले . यद्द्पि इन्होने किताबों में खुद को लिखवाने के

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10 मई – वो पावन दिन जब मेरठ से शुरू हुआ था 1857 का स्वतंत्रता संग्राम ..खुद अंग्रेजों ने लिखा है कि – “क्रांति के मुखिया बहादुरशाह जफर की जगह तात्या टोपे होते तो हम हार जाते”

देश के अंदर रह कर आज़ादी के नारे लगाने वाले ये वही गद्दार हैं जिनके पुरखों ने तब गद्दारी की

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27 अप्रैल – वो दिन जब मणिपुर में अनगिनत बलिदान देने के बाद भी हमारे हाथ से निकल गया था “कांगला का किला”. जंग थी 1857 की

इस इतिहास को बताते तो शायद उनके तथाकथित आका नाराज होते . यद्दपि कलम भी हिलने लगती क्योकि उन्हें सच

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23 अप्रैल- अंग्रेजो के खिलाफ एक और बागवत हिन्दुस्तानी सैनिको की हुई थी आज पेशावर में जब वीर “चन्द्रसिंह गढ़वाली” के आदेश पर राष्ट्रभक्त सैनिको ने रख दिए हथियार

इतिहास के वो नाम जिनको जान बूझ कर गुमनाम किया गया है , उन नामो में से एक नाम है

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16 अप्रैल: बलिदान दिवस पर नमन है 1857 की क्रांति के महानायक विश्वनाथ शाहदेव जी को.. वो योद्धा जो रियासत का राज छोड़ युद्ध किये और प्राप्त की अमरता

ये झोलाछाप इतिहासकारों का पाप ही कहा जाएगा जिन्होंने हमे जानने ही नहीं दिया कि हमारे लिए किस ने त्याग

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अकेले मंगल पाण्डेय ही नहीं , एक और सैनिक उसी समय चढ़ा था फांसी.. लेकिन वो दूसरा नाम मिटा दिया नकली कलमकारों ने

१८५७ की क्रान्ति के उद्घोष में जहाँ मंगल पाण्डेय ने ब्रिटिश सत्ता को हिला दी थी लेकिन उसी समय एक

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