22 नवम्बर: जन्मजयंती वीरांगना झलकारीबाई जयंती. 1857 महायुद्ध की वो महानायिका नारी शक्ति जिनकी यशगाथा सवाल है “बिना खड्ग बिना ढाल” वाले गाने पर

भले ही नकली कलमकारों व कथित इतिहासकारों ने नारी शक्ति की उस प्रतीक के साथ न्याय नहीं किया हो लेकिन

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2 मई – 1908 में आज ही राष्ट्र ने झेली थी कुछ जयचंदों की गद्दारी वरना राष्ट्र पहले ही हो गया होता स्वतन्त्र

आजादी के दीवाने जिन्हें हम विस्मृत कर चुके हैं जिनके बलिदानो के परिणाम स्वरूप आज हम आजादी के हवा में

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1 मई- अंग्रेजो के काल बने क्रांतिवीर प्रफुल्ल चाकी का सिर आज ही काट लिया था भारत के ही एक गद्दार ने .. उसका नाम था दरोगा “बनर्जी’

केवल एक ही परिवार की चाटुकारी और मात्र चरखे के गुण गाने में व्यस्त झोलाछाप और चाटुकारी से सनी कलम

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20 अप्रैल- आज सर्द हिमांचल धधक उठा था 1857 क्रांति ज्वाला से और फूंक दिया गया था थाना कसौली. क्यों छिपाया गया ये इतिहास चरखे के गुण गाने वालों द्वारा ?

यकीनन आप आज़ादी के इतिहास के आज के गौरवशाली पल से परिचित नही होंगे और होंगे भी हरे रंग की

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11 अप्रैल – बलिदान दिवस, बलिदानी खाज्या नायक. मंगल पाण्डेय जैसा ही एक महायोद्धा जिसने ब्रिटिश आर्मी में होते हुए की बगावत और प्राप्त की अमरता

यकीनन इन्हें आप जानते भी नहीं होंगे क्योकि इनका इतिहास बताया ही नहीं गया . झोलाछाप इतिहासकारों की कलमे केवल

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बलिदान दिवस विशेष- मंगल पाण्डेय के खिलाफ अंग्रेजो को नहीं मिल रहे थे गवाह.. तभी सामने आया गद्दार “पल्टू शेख” और वही बना फांसी का जिम्मेदार

हिन्दुओ के खिलाफ फिल्मो के उस्ताद आमिर खान ने भी ये सच अपनी फिल्म मंगल पाण्डेय द राइजिंग में छिपा

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8 अप्रैल- 2 क्रूर अंग्रेज अफसरों का वध कर के आज ही भारत माँ की गोद में सदा के लिए सो गये थे 1857 के महानायक मंगल पाण्डेय जी

आज का पवन दिन उस गाने को गाली के समान साबित करता है जिसे अमूमन हर व्यक्ति को रटाया गया

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बलिदान दिवस विशेष- भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए बहुत कोशिश की थी सुभाषचंद्र बोस ने.. पर कोई था, जिसने नहीं दिया उनका साथ

बहुत कम लोग ही जानते होंगे ये पूरा इतिहास, शायद ही कोई जान पाया हो कि भगत सिंह के बलिदान

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5 मार्च- जन्म दिवस क्रांति वीरांगना सुशीला दीदी.. नारी शक्ति की वो प्रतीक जो कदम से कदम मिला का चली थी भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के साथ

ये वो वीरांगना थीं जो भारत की आन बान और शान को उस समय आगे कर के चल रही थी

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1 मार्च- बलिदान दिवस क्रांतिवीर गोपीमोहन साहा. फांसी के बाद इनका शव तक लेने नहीं गये अहिंसा के कथित पुजारी, पहुचे थे तो सिर्फ सुभाषचंद्र बोस

वो शव लेने आज़ादी के नकली ठेकेदार भी जा सकते थे लेकिन वो नही गये क्योकि उनके हाथ से एक

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