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जहाँ भी घुमा दी नजर, वही जगह उनकी; भारत का भस्मासुर बन चुका है वक्फ बोर्ड.. वोटबैंक के चक्कर मे चढ़ाई गई हिन्दू हितों की बलि

लैंड जिहाद की बुनियाद और संरक्षण का लांच पैड बन चुका था वक्फ बोर्ड

Rahul Panday
  • Apr 2 2025 4:18PM

भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर संसद भवन के लिए आने वाले दिन एतिहासिक बनने जा रहे हैं । जिस देश मे कभी प्रधानमंत्री तक सीना ठोंक कर संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का बताते थे, वहीं बदले समय मे वक्फ संसोधन बिल पारित होने जा रहा है। मजहबी चरमपंथ उबाल मार जाने की आशंका से देश भर मे सुरक्षा व्यवस्था सख्त है, पुलिसकर्मियों की छुट्टियाँ रद्द हैं। कहना गलत नहीं होगा कि दिवंगत थल सेना अध्यक्ष विपिन रावत जी द्वारा बताए गए ढाई मोर्चे मे से आधे वाले मोर्चा को संभालने के लिए आज प्रशासन की पूरी तैयारी है ।

फिलहाल आते हैं जमीनी वास्तविकता पर। वक्फ पर देश मे 2 प्रकार की मानसिकता देखने को मिल रही है। पहले वो लोग हैं जो यह चाहते हैं कि सुदर्शन न्यूज द्वारा दिए गए नाम लैंड जिहाद की मूल जड़ वक्फ बोर्ड को औकात मे रखने वाला बिल पारित हो। असलियत तो ये है कि सुदर्शन न्यूज वक्फ संसोशन नहीं बल्कि वक्फ को समाप्त करने वाले बिल का पक्षधर है। वहीं दूसरी तरफ वो भीड़ है जो वोट बैंक के लिए कभी पाकिस्तान को भारत के अंदर से बांगलदेश तक गुजरने वाली एक हरी पट्टी देने के लिए तैयार बैठे थे।

देश और दुनिया बदल गई, इतिहास भूगोल बदल गया। लेकिन अगर कोई नहीं बदला तो वो हैं वही मुगलिया मानसिकता वाले लोग । तब और अब हिन्दू विरोध और चरमपंथ समर्थन का एक ही ढाल बना रहा । भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता का सारा बोझ सिर्फ और सिर्फ हिन्दू समाज पर लाद देना । जो अच्छा हुआ वो मुगलों ने किया । जो बुरा हुआ उसका निराधार दोषारोपण हिन्दू महापुरुषों और सम्राटों पर ।

सत्ता पक्ष अपने तर्क रख रहा जबकि विपक्ष मे की कुतर्क रखे जा रहे हैं। जो कुछ भी हो रहा है वह बदलते भारत और करवट लेती राजनीति का संकेत है। आज हिन्दू धर्म की बातों पर संसद मे कई सांसद डेस्क पर हाथ मार कर समर्थन करते हैं। कुतर्कों पर कोई यकीन नहीं कर रहा। जनमानस चाहता है कि देश के लिए भस्मासुर बन चुका यह वक्फ बोर्ड पूरी तरह से समाप्त हो। न किसी के खेत सुरक्षति और न ही किसी का मकान। किस मंदिर पर कब दावा ठोंक दिया जाए ये पुजारियों को भी नहीं पता। हद तो तब होती थी जब सरकारी संपत्तियों को भी अपना बताया जाता था।

वक्फ को आधुनिक भस्मासुर क्यों कहना पड़ा हमें। कभी भस्मासुर को वरदान मिला था कि वो जिस पर भी हाथ रख देगा वही भस्म हो जाएगा। तुष्टिकरण से सनी सरकारों से मिले इस अभयदान के बाद वक्फ बोर्ड इधर-उधर, जहाँ-तहाँ अपने हाथ रखने लगा। हर किसी को भस्म कर देने पर आमादा वक्फ बोर्ड बांग्लादेश और नेपाल की सीमाओं से चलता हुआ दिल्ली मे सत्ताधीशों के घर के पास तक पहुँच गया।

जब जागो तभी सवेरा वाली कहावत यहाँ कहीं न कहीं सही साबित हो रही है। एक दृढ़ इच्छाशक्ति और सहिष्णु हिन्दू समाज की भलाई की दूरगामी सोच। यही सब मंथन आज यहाँ तक ले कर आया है। उम्मीद है कि महज वोटबैंक के लिए भारत की विपक्षी राजनीति इतने काँटे नही बोएगी जो आने वाले समय मे उनको ही उस पार न जाने दे।

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