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5 जनवरी : जयंती क्रांतिकारी बारीन्द्र कुमार घोष जी... 10 वर्षों तक अंडमान की जेल में घोर यातना सही और हर यातना के बाद मुंह से निकलता था "वंदेमातरम्"

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी लगभग बारीन्द्र जी 8 वर्ष जीवित रहे , फिर उन्हें क्यों नहीं मिला वो सम्मान और उनके अंतिम यात्रा में क्यों नहीं शामिल हुए वो तमाम जिनके अनुसार उन्होंने इस देश के लिए तमाम त्याग किये हैं. बारीन्द्र कुमार घोष जी अमर रहें.

Sumant Kashyap
  • Jan 5 2025 8:02AM

ये वो नाम हैं जिनसे यकीनन आप परिचित नही होंगे और अगर होंगे तो बहुत कम ही बताया गया होगा इनके बारे में आप को. इस देश के इतिहास में न जाने क्यों और किस कारण से क्रांतिकारियों को स्थान देने के बजाय स्वतंत्रता के उन तमाम तथाकथित ठेकेदारों को आगे रखा गया जो स्वतंत्रता के बाद भी जनता के आगे वोट मांगने और गद्दी मांगने के लिए जाते रहे.

जबकि बटुकेश्वर दत्त और बारीन्द्र कुमार घोष जैसे बलिदानी अपना सर्वस्व न्योछावर करने के बाद भी गुमनाम रहे. आज जानिए कौन थे क्रांतिकारी बारीन्द्र कुमार घोष जिनसे डर कर अंग्रेजो ने उन्हें दूर अंडमान की जेल में भेजा था. बारीन्द्र कुमार घोष का जन्म आज ही के दिन अर्थात 5 जनवरी 1880 को हुआ था. 

उनके पिता कृष्णनाधन घोष एक नामी चिकित्सक व प्रतिष्ठित ज़िला सर्जन थे जबकि उनकी माता जी देवी स्वर्णलता प्रसिद्ध समाज सुधारक व विद्वान् राजनारायण बासु की पुत्री थीं. अरविन्द, जो की पहले क्रन्तिकारी और फिर अध्यात्मवादी हो गए थे.

उनके तीसरे बड़े भाई थे जबकि उनके दूसरे बड़े भाई मनमोहन घोष अंग्रेज़ी साहित्य के विद्वान, कवि और कलकत्ता (वर्तमान कोलकात ) के प्रेसिडेंसी कॉलेज व ढाका यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर थे. बारीन्द्र कुमार घोष की स्कूली शिक्षा देवगढ़ में हुई व सन 1901 में प्रवेश परीक्षा पास करके उन्होंने पटना कॉलेज में दाखिला लिया.

बरोड़ा में उन्होंने मिलिट्री ट्रेनिंग ली. इसी समय अरविन्द घोष से प्रभावित होकर उनका झुकाव क्रांतिकारी आन्दोलन की तरफ़ हुआ. बारीन्द्र कुमार घोष एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और पत्रकार थे. वह बंगाल के एक क्रांतिकारी संगठन जुगंतार के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. 

बारीन्द्र घोष जी का जन्म 5 जनवरी 1880 को लंदन के नॉरवुड में हुआ था. वे अरबिंदो घोष के छोटे भाई थे. उन्होंने देवघर में स्कूली शिक्षा और पटना कॉलेज में भाग लिया. उन्होंने बड़ौदा में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया इस समय के दौरान, (1800 के अंत -1900 के शुरुआती दिनों) बारिन अरबिंदो से प्रभावित थे.

वो क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति आकर्षित थे. बारिन कोलकाता लौट आए और जतिन्द्रनाथ बनर्जी की मदद से बंगाल के कई क्रांतिकारी समूहों का आयोजन शुरू कर दिया. जल्द ही उन्होंने युगांतार, एक बंगाली साप्ताहिक प्रकाशित करना शुरू कर दिया और एक क्रांतिकारी संगठन जुगंतार का शीघ्र ही पालन किया. जुगांत का गठन अनुशासन समिति के आंतरिक चक्र से किया गया और इसके आतंकवादी गतिविधियों को शुरू किया. बरिन और बाघा जतिन बंगाल के कई युवा क्रांतिकारियों की भर्ती में सहायक थे. क्रांतिकारियों ने मणिकत्ला समूह, कोलकाता में एक गुप्त स्थान का गठन किया - जहां उन्होंने बम का निर्माण शुरू किया और हथियारों और गोला-बारूद एकत्र किए.

कार्य की सहूलियत के लिए अनुशीलन समिति का दूसरा कार्यालय 1904 में ढाका में खोला गया, जिसका नेतृत्व पुल्लिन बिहारी दास और पी. मित्रा ने किया. ढाका में इसकी लगभग 500 शाखाएं थीं. इसके अधिकांश सदस्य स्कूल और कॉलेज के छात्र थे. सदस्यों को लाठी, तलवार और बन्दूक चलने का प्रशिक्षण दिया जाता था.

हालाँकि बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं. इनको बारिन घोष के नाम से भी जाना जाता है. वे अध्यात्मवादी अरविन्द घोष जी के छोटे भाई थे. बंगाल क्षेत्र में क्रांतिकारी विचारधारा को फैलाने का श्रेय बारीन्द्र कुमार और भूपेन्द्र नाथ दत्त, जो कि स्वामी विवेकानंद के छोटे भाई थे, को ही जाता है.'

इसी के साथ राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए स्वदेशी आन्दोलन की भी बारीन्द्र जी पूरी चेतना से काम कर रहे थे. इसी के परिणामस्वरूप बारीन्द्र कुमार घोष ने क्रांतिकारी विचारों का प्रचार करने के लिए वर्ष1906 में एक साप्ताहिक 'युगान्तर' का प्रकाशन प्रारम्भ किया. 

उन्होंने वर्ष 1907 में क्रांतिकारी राष्ट्रवादी गतिविधियों का संयोजन करने के लिए 'मणिकतल्ला पार्टी' का गठन भी किया था. सन 1908 में इन्हें गिरफ़्तार कर मृत्यु दण्ड की सजा सुनाई गई, किन्तु बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया. मौत से भी ज्यादा भयानक यातना के लिए जानी जाने वाले अंडमान जेल में 10 वर्ष बिताने के बाद इन्होंने अपना शेष समय पत्रकारिता में लगाया. आज वीरता के उन शक्तिपुंज और शौर्य के उस प्रतीक को सुदर्शन परिवार उनके जन्मदिवस पर बारम्बार नमन करता है और उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है.

 इसी के साथ सवाल करता है आज़ादी के उन तमाम तथाकथित ठेकेदारों और स्वघोषित इतिअहास्कारो और नकली कलमकारों से कि उन्होंने क्यों और किस के इशारे पर ऐसे वीरों के सच्चे इतिहास से भारत की जनता को वंचित रखा ?

भारत की स्वतंत्रता के बाद भी लगभग बारीन्द्र जी 8 वर्ष जीवित रहे , फिर उन्हें क्यों नहीं मिला वो सम्मान और उनके अंतिम यात्रा में क्यों नहीं शामिल हुए वो तमाम जिनके अनुसार उन्होंने इस देश के लिए तमाम त्याग किये हैं. बारीन्द्र कुमार घोष जी अमर रहें.

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