सनातन हिंदू परंपरा: अनंत धाराओं का महासागर
महा कुंभ लेखमाला – लेख क्रमांक 33
लेखक:
डॉ. सुरेश चव्हाणके (चेयरमैन एवं मुख्य संपादक, सुदर्शन न्यूज़ चैनल)
प्रस्तावना: सनातन धर्म – एक धर्म नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन
सनातन धर्म को अक्सर केवल एक धर्म या पंथ के रूप में देखा जाता है, लेकिन क्या यह केवल उतना ही सीमित है?
क्यों इसमें इतने विविध मत, संप्रदाय और परंपराएँ समाहित हैं?
क्या यह केवल भारत तक सीमित है, या इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा है?
क्या सनातन धर्म सिर्फ पूजा-पद्धतियों का समूह है, या यह संपूर्ण जीवनशैली और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक है?
सनातन धर्म केवल एक धार्मिक विचारधारा नहीं, बल्कि अनंत धाराओं का महासंगम है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक और दार्शनिक आंदोलन है, जिसने हजारों वर्षों तक मानव सभ्यता का मार्गदर्शन किया है।
इसकी सबसे महानतम विशेषता यह है कि यह किसी एक विचारधारा, एक पुस्तक, या एक संस्थापक पर निर्भर नहीं है। यह अनादि काल से चली आ रही एक परंपरा है, जो समय के साथ बदलती और विकसित होती रही है।
इस लेख में हम देखेंगे कि सनातन धर्म के अंतर्गत कौन-कौन से पंथ, मत, संप्रदाय और परंपराएँ समाहित हैं, और कैसे यह अनंत विविधताओं के बावजूद एकीकृत रहता है।
सनातन धर्म की संरचना – यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि संपूर्ण दर्शन है
यह एकरूप नहीं, बल्कि बहुरूप है।
यह स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है।
यह सीमित नहीं, बल्कि असीमित है।
सनातन धर्म के ये तीन मुख्य पहलू इसे विश्व के किसी भी अन्य धर्म से अलग बनाते हैं।
यह एक पुस्तक, एक पैगंबर, या एक सिद्धांत पर आधारित नहीं है।
इसमें भिन्न-भिन्न मतों, विचारों, और परंपराओं को स्वीकार किया जाता है।
यह केवल मुक्ति (मोक्ष) पर ही केंद्रित नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
सनातन धर्म के प्रमुख दर्शन – गहन वैचारिक आधार
सनातन धर्म की गहराई को समझने के लिए हमें इसके छह प्रमुख दार्शनिक मतों को समझना होगा। ये सनातन धर्म के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार हैं।
न्याय दर्शन (गौतम ऋषि)
सत्य की खोज के लिए प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र प्रमाण को मानता है।
वैशेषिक दर्शन (कणाद ऋषि)
परमाणु सिद्धांत और भौतिक जगत की संरचना को स्पष्ट करता है।
सांख्य दर्शन (कपिल मुनि)
प्रकृति और आत्मा के द्वैत को परिभाषित करता है।
योग दर्शन (पतंजलि मुनि)
ध्यान, समाधि और अष्टांग योग के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाता है।
मीमांसा दर्शन (जैमिनी ऋषि)
यज्ञ, कर्मकांड और वेदों के नियमों की व्याख्या करता है।
वेदांत दर्शन (बादरायण व्यास)
अद्वैत, द्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसे सिद्धांतों को स्पष्ट करता है।
इन्हीं छह दर्शनों से सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदाय और मत विकसित हुए।
सनातन धर्म के भीतर शैव, वैष्णव, शाक्त परंपराएँ
शैव संप्रदाय – भगवान शिव को सर्वोच्च मानने वाले अनुयायी।
पाशुपत संप्रदाय
नाथ संप्रदाय
वीर शैव
वैष्णव संप्रदाय – भगवान विष्णु और उनके अवतारों की उपासना करने वाले।
रामानुजाचार्य संप्रदाय
मध्व संप्रदाय
वल्लभाचार्य संप्रदाय
शाक्त संप्रदाय – माँ शक्ति की उपासना करने वाले।
काली कुल
त्रिपुर सुंदरी कुल
बगलामुखी साधना
ये सभी उपासना पद्धतियाँ भले ही अलग-अलग दिखती हैं, लेकिन ये सभी सनातन धर्म के भीतर ही आती हैं।
सनातन धर्म का वैश्विक प्रभाव
शिंतो धर्म (जापान) – वेदों और प्रकृति पूजा पर आधारित।
ताओवाद (चीन) – योग और ध्यान से प्रभावित।
जेन बौद्ध धर्म (जापान) – जैन और बौद्ध परंपराओं का मिश्रण।
यज़ीदी धर्म (मध्य पूर्व) – कई हिंदू प्रतीकों और परंपराओं का समावेश।
सनातन धर्म केवल भारतीय परंपरा नहीं, बल्कि एक वैश्विक विचारधारा है।
निष्कर्ष – सनातन धर्म केवल एक मत नहीं, बल्कि अनंत विचारों की धारा है
यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि दर्शन, विज्ञान, तर्क, योग और आत्म-साक्षात्कार का संगम है।
कुछ परंपराएँ विलुप्त हो चुकी हैं, लेकिन उनके विचार आज भी जीवंत हैं।
भारत के बाहर भी सनातन धर्म के प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सनातन धर्म केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांडीय जीवन दृष्टि है।
समापन – महाकुंभ से क्या सीखें
कुंभ मेला सिर्फ साधुओं और भक्तों का संगम नहीं, बल्कि यह सनातन धर्म की जीवंतता का प्रमाण है।
यह सिद्ध करता है कि हजारों वर्षों बाद भी, सनातन धर्म समय के साथ चलता आया है और अनंत धारा में प्रवाहित हो रहा है।
यह हमें यह भी सिखाता है कि भिन्न-भिन्न मतों, पंथों और विचारधाराओं के बावजूद हम सभी सनातन धर्म के ही अंग हैं।
जो सनातन है, वह कभी समाप्त नहीं हो सकता – यह अनंत है, असीम है और शाश्वत है।