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महा कुंभ और जलवायु परिवर्तन: सनातन धर्म का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति संरक्षण

डॉ सुरेश चव्हाणके द्वारा लिखित #महाकुम्भ_लेखमाला में 36 वा लेख।

Dr. Suresh chavhanke
  • Feb 14 2025 1:05PM

महा कुंभ और जलवायु परिवर्तन: सनातन धर्म का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकृति संरक्षण

 

महा कुंभ लेखमाला – लेख क्रमांक 36

 

लेखक: डॉ. सुरेश चव्हाणके (चेयरमैन एवं मुख्य संपादक, सुदर्शन न्यूज़ चैनल)

प्रस्तावना: पश्चिमी भोगवाद से उत्पन्न जलवायु संकट का समाधान महा कुंभ से सकता है? मेरा उत्तर है हां! 

आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वॉर्मिंग, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। विश्व के नेता और वैज्ञानिक इस पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन क्या वे जानते हैं कि सनातन धर्म में यह सिद्धांत करोड़ों वर्षों पहले ही स्थापित हो चुका है?

पश्चिमी दुनिया आज जिस ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘इकोलॉजिकल बैलेंस’ की बात कर रही है, वह हिंदू जीवनशैली का मूल आधार है।

क्या ईसाई और इस्लामी दृष्टिकोण में भी प्रकृति को पूजनीय माना गया है, या वे केवल उपभोग और प्रभुत्व की सोच रखते हैं?

कुंभ मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जल, पृथ्वी, वायु और प्रकृति के सम्मान का जीवंत उदाहरण है।

क्या कुंभ का यह संदेश जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है?

पंचमहाभूतों की पूजा: सनातन हिंदू धर्म बनाम पश्चिमी दृष्टिकोण

सनातन हिंदू परंपरा में पंचमहाभूतों – पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश – की पूजा की जाती है।

ऋग्वेद कहता है – “पृथ्वी माता, द्योः पिता” अर्थात पृथ्वी माँ है और आकाश पिता।

उपनिषदों में कहा गया है – “आपो वै अमृतम्” यानी जल ही अमृत है।

लेकिन क्या इस्लाम और ईसाई धर्म में प्रकृति को पूजनीय माना गया है?

इस्लाम में प्रकृति का दृष्टिकोण

इस्लाम में प्रकृति को मनुष्य के अधीन माना गया है, न कि पूजनीय।

क़ुरान (सूरह 45:13) कहता है कि अल्लाह ने सारी सृष्टि मनुष्य के लिए बनाई है। इस लिए उसका प्रकृति के प्रति कोई कर्तव्य नहीं है। वह केवल उपभोग करता ह। 

इस्लाम में जल, वृक्ष और पशुओं की पूजा नहीं होती, बल्कि उनका उपयोग मात्र संसाधन के रूप में किया जाता है।

ईसाई धर्म में प्रकृति का दृष्टिकोण

बाइबल (उत्पत्ति 1:26) में कहा गया है कि ईश्वर ने मनुष्य को पृथ्वी पर शासन करने के लिए बनाया।

ईसाईयत में प्रकृति की रक्षा की कोई भी परंपरा नहीं है। 

पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति के नाम पर जंगलों की कटाई, नदियों का दोहन और प्राकृतिक संसाधनों का भारी शोषण किया गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि आज पश्चिमी देश जलवायु संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि सनातन हिंदू संस्कृति में प्रकृति आज भी सुरक्षित है।

कुंभ मेला: जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन का पर्व

कुंभ मेले का आयोजन भारत की प्रमुख नदियों गंगा, यमुना, गोदावरी और क्षिप्रा के तट पर होता है।

कुंभ से पहले नदी सफाई अभियान चलाए जाते हैं।

कुंभ के दौरान नदी के जल को अमृततुल्य मानकर उसकी पवित्रता बनाए रखी जाती है।

जल को केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि पूजनीय धरोहर माना जाता है।

2019 प्रयागराज कुंभ में गंगा सफाई अभियान ने नदी की गुणवत्ता में सुधार किया।

हरिद्वार कुंभ 2021 में ‘प्लास्टिक मुक्त कुंभ’ पहल चलाई गई।

 2025 के प्रयागराज महा कुम्भ को हरित कुंभ कहा गया है। इसके लिए कई योजनाओं को लाया गया ह। आपको कुंभ में कहीं पर भी कचरा नहीं मिलेगा। 

लेकिन इस्लामिक और ईसाई सभ्यता में जल का क्या महत्व है?

इस्लाम में पानी को सिर्फ एक संसाधन माना जाता है, न कि पूजनीय।

मक्का और मदीना जैसे इस्लामिक तीर्थस्थलों में जल संरक्षण की कोई विशेष परंपरा नहीं मिलती।

पश्चिमी दुनिया में समुद्रों और नदियों को उद्योगों और कारखानों के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे जल प्रदूषण चरम पर है।

अगर पूरी दुनिया कुंभ से यह सीख ले, तो जल संकट को हल किया जा सकता है।

कुंभ और वृक्षारोपण – हरियाली का महोत्सव

सनातन धर्म में वृक्षों की पूजा की जाती है।

ऋषि-मुनियों ने वनों में तपस्या कर यह सिद्ध किया कि प्रकृति और आध्यात्मिकता का गहरा संबंध है।

कुंभ के दौरान हजारों पौधे लगाए जाते हैं, जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है।

जहाँ पश्चिमी दुनिया जंगल काटकर विकास करना चाहती है, वहाँ कुंभ हमें सिखाता है कि असली विकास प्रकृति को संजोने में है।

कुंभ बनाम आधुनिक Thankless Approach

पश्चिमी सभ्यता और सनातन संस्कृति में अंतर:

वहाँ Thankless Consumption है, यहाँ हर अन्न, जल और वायु के लिए धन्यवाद।

वहाँ जल सिर्फ एक संसाधन है, यहाँ गंगा माता के समान पूजनीय।

वहाँ विकास विनाश के साथ होता है, यहाँ प्रकृति संरक्षित रहकर फलती-फूलती है।

अगर पश्चिम Thankless Approach छोड़कर कुंभ की सीख ले, तो जलवायु संकट समाप्त हो सकता है।

क्या कुंभ से जलवायु परिवर्तन की लड़ाई जीती जा सकती है?

हाँ, क्योंकि –

कुंभ के दौरान नदी की सफाई होती है, जिससे जल प्रदूषण घटता है।

श्रद्धालु पेड़ लगाते हैं, जिससे वनों का संरक्षण होता है।

कुंभ के बाद श्रद्धालु जीवनभर पर्यावरण के प्रति जागरूक रहते हैं।

जो व्यक्ति कुंभ में आता है, वह वापस जाने के बाद कभी भी जल, वायु, मिट्टी और प्रकृति का दुरुपयोग नहीं कर सकता।

वह जानता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड जीवंत है, और हर कण पूजनीय है।

निष्कर्ष: कुंभ – जलवायु संतुलन और सनातन धर्म का संदेश

कुंभ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरण, प्रकृति और पारिस्थितिकी संरक्षण का दिव्य संदेश है।

आज जो वैज्ञानिक और नेता जलवायु परिवर्तन की चिंता कर रहे हैं, हमारे ऋषियों ने उसे हजारों साल पहले समझ लिया था।

अगर आधुनिक विश्व कुंभ की सीख को अपनाए, तो जलवायु संकट समाप्त हो सकता है।

कुंभ हमें सिखाता है कि जब हम प्रकृति का उपयोग करें, तो उसे सम्मान भी दें।

जो सनातन धर्म का अनुयायी है, वह नदियों, जंगलों, जीवों और पूरी प्रकृति को अपनी माँ के समान पूजता है।

कुंभ मेला धर्म, प्रकृति और मानवता के बीच संतुलन बनाए रखने का सबसे बड़ा संदेश देता है।

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