ये दोष है भारत की आजादी के नकली ठेकेदारों का और अक्षम्य पाप है उनकी चाटुकारी करने वाले तथाकथित इतिहासकारों का जिन्होंने राष्ट्र के असल नायकों को अपनी झूठी प्रसिद्धि के लिए सामने नहीं आने दिया इसके अलावा देश जान पाए अपने असली पूर्वजो को और उनके शौर्य को इसलिए उनके नाम को दफनाने का कुत्सित प्रयास भी किया.
लेकिन इस प्रयास में आख़िरकार वो खुद ही दफन हो गये और आज़ादी के महयोद्धाओ का तेज घनघोर बादलों को चीर कर भी निकल आया. झोलाछाप इतिहासकारों के पाप और आज़ादी के झूठे ठेकेदारों के शिकार एक महान क्रांतिवीर शचीन्द्र नाथ सान्याल जी का आज बलिदान दिवस है.
शाचींद्रनाथ सान्याल भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। वे राष्ट्रीय व क्रांतिकारी आंदोलनों में सक्रिय भागीदार होने के साथ ही क्रांतिकारियों की नई पीढ़ी के प्रतिनिधि भी थे. इसके साथ ही वे 'गदर पार्टी' और 'अनुशीलन संगठन' के दूसरे स्वतंत्रता संघर्ष के प्रयासों के महान कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे.
वर्ष 1923 में उनके द्वारा खड़े किए गये 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' को ही भगत सिंह एवं अन्य साथियों ने 'हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ' के रूप में विकसित किया. शचीन्द्रनाथ सान्याल को जीवन में दो बार 'काला पानी' की सजा मिली.
हरनाथ सान्याल उनके पिता और क्षीरोदा बासनी देवी उनकी माता का नाम था. उनके पितामह आदि गृहस्थ सन्यासी थे. उनके भाई जतिंद्रनाथ एवं भूपेन्द्रनाथ बहुत महान क्रांतिकारी थे जो भारत माँ की परतंत्रता की बेडियां काटने के लिए लड़े थे.
सचिन्द्र जी अभी विद्यार्थी ही थे कि पिताजी का देहांत हो गया. वह घर में सबसे बड़े पुरुष सदस्य थे. माँ ने उनका अनेक आर्थिक संकटो के बीच पालन-पोषण किया. शचीन दा जैसे विप्लवी शताब्दी में कभी कभी ही जन्म लेते है! वे सन १९०९ में कलकत्ता में विप्लवी दल में सम्मिलित होकर सशस्त्र स्वतंत्रता-संग्राम में सक्रीय हुए.
सन १९१५ में जब पूरे भारत में सेना में छावनी-दर-छावनी क्रांति का शंखनाद गुंजाने की योजना बनी तो उस समय शचीन दा ही रास बिहारी बोस के प्रमुख सहयोगी किंवा दाहिने हाथ थे! शचीन दा लाहोर षड़यंत्र तथा बनारस-षड़यंत्र दोनों में ही बंदी बनाए गए! १९१५ में वे बंदी बना लिए गए और आजीवन काले पानी का दंड देकर अंडमान भेज दिए गए!
उस समय वाराणसी में जो इनका पैतृक घर था, उसे भी दमनकारी ब्रिटिश सरकार ने बलात जब्त कर लिया था! 5 वर्ष बाद जब फिर सन १९२० में ब्रिटिश सरकार ने शाही (रॉयल) आम माफ़ी (सर्वक्षमा) की घोषणा की तो शचीन दा भी अंडमान द्वीप समूह के कारावास से मुक्त होकर काशी लौटे!
परन्तु एक बार काले पानी के त्रासद कारावास में रह आने पर भी शचीन दा निष्क्रिय होकर घर नहीं बैठे वरन उन्होंने पुनः उत्तर प्रदेश में अनुशीलन समिति का संगठन किया तथा उस समय कारागारों में राजनैतिक बंदियों की जो दुर्दशा थी उस पर अनेक लेख लिख कर पात्र पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाए!
फिर इस उद्योग में भी सलग्न हुए कि भारत में विराट क्रांति के लिए दक्षिण-पश्चिम एशिया के मार्ग से किस प्रकार गोला बारूद और शस्त्रास्त्र मंगाए जाएँ !इस प्रसंग में वे सन १९२० में ही, जबकि उसी वर्ष वे काले पानी से मुक्त हुए थे, फिर से २५ फरवरी को बंदी बना लिए गए!
इस समय उन्हें 2 वर्ष का कठोर कारावास दिया गया! अभी शचीन दा यह कारावास भुगत ही रहे थे कि उनपर काकोरी षड़यंत्र में सक्रीय रूप से सम्मिलित रहने का मुक़दमा थोप दिया गया, जिसमे अदालत ने उन्हें दुबारा आजीवन काले पानी का दंड सुनाया! फलतः शचीन दा दुबारा अंडमान द्वीप-समूह भेज दिए गए!
वीर सावरकर जी के अतिरिक्त दुबारा काले पानी का दंड शचीन्द्रनाथ सान्याल को ही दिया गया था और सावरकर बंधुओं की ही भांति ये सब सान्याल-बंधू भी कारागारों में लम्बी सजाएं काटते रहे थे! 1937 में संयुक्त प्रदेश में कांग्रेस मंत्रिमंडल की स्थापना के बाद अन्य क्रांतिकारियों के साथ वे रिहा किए गए.
रिहा होने पर कुछ दिनों वे कांग्रेस के प्रतिनिधि थे, परंतु बाद को वे फारवर्ड ब्लाक में शामिल हुए. इसी समय काशी में उन्होंने 'अग्रगामी' नाम से एक दैनिक पत्र निकाला. वह स्वयं इसस पत्र के संपादक थे. द्वितीय महायुद्ध छिड़ने के कोई साल भर बाद 1940 में उन्हें पुन: नजरबंद कर राजस्थान के देवली शिविर में भेज दिया गया. वहाँ यक्ष्मा रोग से आक्रांत होने पर इलाज के लिए उन्हें रिहा कर दिया गया.
दिल्ली के इसी अधिवेशन में शाचीन्द्रनाथ सान्याल ने देश के बन्धुओं के नाम एक अपील जारी की. इसमें उन्होंने सम्पूर्ण भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य और भविष्य में सम्पूर्ण एशिया का महासंघ बनाने का विचार प्रस्तुत किया. उनके द्वारा 'रिवोल्यूशनरी' लिखा गया पर्चा एक ही दिन में रंगून से पेशावर तक बांटा गया था.
पर्चे को लिखने और वितरित करने के आरोप में उन्हें फरवरी, 1925 में दो वर्ष की सजा हुई. छूटने के बाद 'काकोरी काण्ड' के केस में उन्हें पुन: गिरफ्तार किया गया और दुबारा काले पानी की सजा दी गयी. वर्ष 1937-1938 में कांग्रेस मंत्रीमंडल ने जब राजनीतिक कैदियों को रिहा किया तो उसमे शाचीन्द्रनाथ भी रिहा हो गये.
लेकिन उन्हें घर पर नजरबंद कर दिया गया. 7 फरवरी सन 1942 में भारत का यह महान क्रांतिकारी चिर निद्रा में सो गया. यद्दपि इनके बलिदान को नकली और देशद्रोही सोच वाले इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नो में स्थान नहीं दिया लेकिन इनके जीवन के महान कार्यों ने कभी इनको विस्मृत नही होने दिया और ऐसा क्रांतिवीर को सदा सदा के लिए अमर कर दिया.
आज उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार उन्हें बारम्बार नमन करता है और उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है.